पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Gangaa - Goritambharaa)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Gangaa - Gangaa ( words like Grihapati, Grihastha/householder etc. )

Gangaa - Gaja (Gangaa, Gaja/elephant etc.)

Gaja - Gajendra (Gaja, Gaja-Graaha/elephant-crocodile, Gajaanana, Gajaasura, Gajendra, Gana etc.)

Gana - Ganesha (Ganapati, Ganesha etc.)

Ganesha - Gadaa (Ganesha, Gandaki, Gati/velocity, Gada, Gadaa/mace etc. )

Gadaa - Gandhamaali  ( Gadaa, Gandha/scent, Gandhamaadana etc. )

Gandharva - Gandharvavivaaha ( Gandharva )

Gandharvasenaa - Gayaa ( Gabhasti/ray, Gaya, Gayaa etc. )

Gayaakuupa - Garudadhwaja ( Garuda/hawk, Garudadhwaja etc.)

Garudapuraana - Garbha ( Garga, Garta/pit, Gardabha/donkey, Garbha/womb etc.)

Garbha - Gaanabandhu ( Gavaaksha/window, Gaveshana/research, Gavyuuti etc. )

Gaanabandhu - Gaayatri ( Gaandini, Gaandharva, Gaandhaara, Gaayatri etc.)

Gaayana - Giryangushtha ( Gaargya, Gaarhapatya, Gaalava, Giri/mountain etc.)

Girijaa - Gunaakara  ( Geeta/song, Geetaa, Guda, Gudaakesha, Guna/traits, Gunaakara etc.)

Gunaakara - Guhaa ( Gunaadhya, Guru/heavy/teacher, Guha, Guhaa/cave etc. )

Guhaa - Griha ( Guhyaka, Gritsamada, Gridhra/vulture,  Griha/home etc.)

Griha - Goritambharaa ( Grihapati, Grihastha/householder etc.)

 

 

 

 

 

 

 

Puraanic contexts of word Gangaa/Ganges are given here.

ग अग्नि ३४८.४ ( गन्धर्व, विनायक,गीत व गायक हेतु ग के प्रयोग का उल्लेख ) ।

 

गगन योगवासिष्ठ ५.३१.५८( प्रह्लाद द्वारा शिर में गगन की धारणा का उल्लेख )

 

गङ्गा अग्नि ११० ( गङ्गा का संक्षिप्त माहात्म्य ), १५९ ( गङ्गा जल में अस्थि प्रक्षेपण से मृत व्यक्ति के अभ्युदय तथा हित का उल्लेख ), ३२३.३ (गङ्गा मन्त्र के जप द्वारा कर्म सिद्धि का कथन ), कूर्म  १.३७.३० ( प्रयाग माहात्म्य के अन्तर्गत गङ्गा महिमा का वर्णन ), १.३७.३१ ( गङ्गा के त्रिपथा नाम के हेतु का कथन ), १.३७.३७ ( कृतयुग में नैमिष, त्रेता में पुष्कर, द्वापर में कुरुक्षेत्र तथा कलियुग में गङ्गा की विशिष्टता का उल्लेख ), १.४६ ( विष्णुपाद से नि:सृत गङ्गा के मेरुपर्वतस्थ ब्रह्मपुरी के चारों ओर गिरने पर चार भागों में विभक्त होने का उल्लेख ), गरुड ३.२२.२८(गङ्गा के १२ लक्षणों से युक्त होने का उल्लेख), ३.२९.३(वरुण-भार्या, निरुक्ति, हरिपद से निःसृत गंगा की प्रशंसा), ३.२९.९(भागीरथी गङ्गा के ४ रूपों का कथन), गर्ग १.३.३८ ( श्री भगवान के वसुदेव व देवकी के पुत्र रूप में अवतार ग्रहण करने पर गङ्गा / जाह्नवी के मित्रविन्दा नाम धारण का उल्लेख ), २.२०.६ ( गङ्गा द्वारा राधा को मञ्जीर नामक दिव्य भूषण अर्पित करने का उल्लेख ), २.२०.२७ (कृष्ण द्वारा भूमि पर वेत्र ताडन से वेत्र गङ्गा की उत्पत्ति तथा वेत्रगङ्गा की महिमा का उल्लेख ), देवीभागवत २.३.१८ ( ब्रह्मसदन में आसीन राजा महाभिष व गङ्गा महानदी के परस्पर काममोहित होने पर ब्रह्मा द्वारा शाप दान का उल्लेख ), २.४ ( ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त शाप के वशीभूत होकर महाभिष का राजा शन्तनु के रूप में तथा गङ्गा नदी का मानुषी रूप में जन्म लेना, शन्तनु व गङ्गा का विवाह, वसुओं के शाप मोक्षण हेतु गङ्गा द्वारा अपने वसु रूप सात पुत्रों का गङ्गा जल में प्रक्षेपण, अष्टम पुत्र को गाङ्गेय नाम से शन्तनु को प्रदान करने का वृत्तान्त ), ८.७.१३ ( विष्णु के वाम पाद के अङ्गुष्ठ से निर्मित ब्रह्माण्ड छिद्र से उत्पन्न होकर गङ्गा का स्वर्ग में प्रवेश, ब्रह्मलोक में गङ्गा के चार धाराओं में विभक्त होने का कथन ), ९.१.६० ( प्रधानांश स्वरूपा गङ्गा देवी का माहात्म्य ), ९.११ ( भगीरथ की तपस्या से गङ्गा का भारत में आगमन, गङ्गा स्नान से पापों से मुक्ति, सहस्रों जनों के पापों से मलिन होने पर गङ्गा का कृष्ण से स्व उद्धार का उपाय पूछना, कृष्ण द्वारा उपाय का कथन, भिन्न भिन्न तिथियों में गङ्गा स्नान का फल, कलियुग के ५ सहस्र वर्ष पर्यन्त गङ्गा की भारत में स्थिति का वर्णन ), ९.१२ ( गङ्गा के कण्व शाखोक्त ध्यान व षोडश उपचार से अश्वमेध फल की प्राप्ति का कथन ), ९.१२.१८ ( गङ्गा स्तोत्र से भगीरथ द्वारा गङ्गा स्तुति, सगर- पुत्रों को गङ्गा के स्पर्श से वैकुण्ठ प्राप्ति, भगीरथ द्वारा लाए जाने से गङ्गा का भागीरथी नाम धारण करना ), ९.१३ ( कृष्ण के साथ गङ्गा के संग को देखकर राधा का रोष, रोष से भयभीत हुई गङ्गा का कृष्ण के चरणकमलों में छिपकर अदृश्य होना, अदृश्य होने पर गोलोक की शुष्कप्राय स्थिति, ब्रह्मादि की प्रार्थना पर गङ्गा का कृष्ण के चरण कमल से निर्गत होना तथा विष्णुपदी नाम धारण करने का वृत्तान्त ), ९.१४ ( कृष्ण द्वारा गङ्गा से गान्धर्व विवाह तथा गङ्गा का नारायण की प्रिया होने का कथन ), ९.१९.६६( गङ्गा द्वारा विष्णु की चामर द्वारा सेवा का उल्लेख ), नारद १.६.६४( गायत्री के प्रसन्न होने पर गङ्गा के भी प्रसन्न होने का कथन ), १.९.१९ ( सनक द्वारा गङ्गा के माहात्म्य का वर्णन ), १.९.४४( वसिष्ठ द्वारा कल्माषपाद राक्षस को गङ्गा के बिन्दुओं के अभिषेक से मुक्ति प्राप्ति का कथन ), १.९.११३( गर्ग विप्र द्वारा कल्माषपाद राक्षस का गङ्गा जल से सिंचन करने पर राक्षसी योनि से मुक्ति का वृत्तान्त ), १.११.१७९ ( वामन त्रिविक्रम द्वारा पाद क्रमण के समय पादाङ्गुष्ठ द्वारा ब्रह्माण्ड के भेदन से बाह्य सलिल का आगमन तथा गङ्गोत्पत्ति का कथन ), १.११६.११ ( जह्नु द्वारा क्रोधपूर्वक गङ्गा का पान तथा दक्षिण कर्ण छिद्र से निर्गमन का उल्लेख ), २.३८ ( वसु ब्राह्मण द्वारा मोहिनी को गङ्गा के माहात्म्य का वर्णन, तिथि अनुसार गङ्गा का पाताल, भूमि व स्वर्ग में वास तथा कलियुग में गङ्गा के वैशिष्ट्य का कथन ), २.३९ ( वसु द्वारा मोहिनी को गङ्गा स्नान के माहात्म्य का वर्णन ), २.४० ( कालविशेष तथा स्थल विशेष में गङ्गा स्नान के माहात्म्य तथा फल का कथन ), २.४१ ( गङ्गा तट पर तर्पण, पूजन व दान के माहात्म्य का वर्णन ), २.४२.३१ ( गङ्गा पूजा की विधि ), २.४३.६६ ( गङ्गा दशहरा स्तोत्र तथा गङ्गा माहात्म्य ), पद्म १.१४.१९०(उदङ्मुखी गङ्गा के पवित्र होने का उल्लेख), १.६२.१( गङ्गा माहात्म्य का वर्णन ), १.६२.८४( गङ्गा की उत्पत्ति के संदर्भ में माया रूपी प्रकृति के ७ रूपों में से एक रूप के गङ्गा होने का वर्णन ), ३.४३.५१( गङ्गा के त्रिपथा नाम का कारण ), ६.८१.२४ (गङ्गा माहात्म्य का वर्णन ), ५.८५.४(मानसिक, वाचिक व कायिक भक्तियों का कथन), ५.८५.४९ ( वैशाख शुक्ल सप्तमी में गङ्गा के अर्चन तथा माहात्म्य का कथन ), ६.२० ( भगीरथ द्वारा गङ्गा अवतारण की कथा ), ६.२२ (गङ्गा माहात्म्य व स्तोत्र ), ६.१११.२६ ( स्वरा के शाप वश ब्रह्मा का ककुद्मिनी गङ्गा रूप होने का उल्लेख ), ६.१२७.४८( काशी में गङ्गा के उत्तर वाहिनी व प्रयाग में पश्चिम् वाहिनी होने का उल्लेख ), ६.२४०.४२(ब्रह्मा द्वारा कमण्डलु जल से विष्णु के पाद प्रक्षालन करने पर गंगा की उत्पत्ति का कथन),  ६.२४०.५४ ( बलि की कथा के अन्तर्गत गङ्गा उत्पत्ति का प्रसंग ), ७.३ ( गङ्गा के माहात्म्य का कथन : मनोभद्र - गृध्र संवाद ), ७.७ (गङ्गा के माहात्म्य का कथन : धर्मस्व ब्राह्मण कथा ), ७.८ ( गङ्गा के माहात्म्य का कथन : पद्मगन्धा की कथा ), ७.९ ( गङ्गा के माहात्म्य का कथन : भेक की कथा ), ब्रह्म १.६.७६ ( दिलीप - पुत्र भगीरथ द्वारा गङ्गा अवतारण का उल्लेख ), १.२२ ( आकाशगङ्गा : सूर्य द्वारा जल वितरण का उल्लेख ), २.३.३६ ( शिव द्वारा लोकहितार्थ ब्रह्मा को भूमि रूपी कमण्डलु में पवित्र गङ्गा को प्रदान करने का कथन ), २.४.६३ ( विष्णु के चरण कमलों में अर्घ्यस्वरूप प्रदत्त जल का चार धाराओं में विभक्त होकर मेरु पर गिरना, दक्षिण धारा के महेश्वर की जटाओं में आगमन का निरूपण ), २.१५.१४( कण्व द्वारा क्षुधा रूपी भीषण गङ्गा की स्तुति ), २.१०३.३( ७ ऋषियों द्वारा गङ्गा के सप्तधा विभाजन का कथन ), ब्रह्मवैवर्त्त २.१.६१ ( गङ्गा के प्रकृति देवी के प्रधानांशस्वरूपा होने का उल्लेख ), २.५ ( पार्वती भय से गङ्गा का शिवजटा में अदृश्य होना, पार्वती द्वारा गङ्गा निष्कासन का उद्योग ), २.६( गङ्गा के सकामा होने पर सरस्वती का कोप, परस्पर कलह तथा शाप प्रदान, शाप के फलस्वरूप गङ्गा व सरस्वती के पृथ्वी पर नदी रूप में परिणत होने का वर्णन ), २.६( गौतम ब्राह्मण द्वारा शिव की स्तुति, गौतम के जटा सहित गङ्गा के एक भाग को लेकर ब्रह्मगिरि पर गमन का वृत्तान्त ), २.७.८( गौतम के वचनानुसार गङ्गा का ब्रह्मगिरि से ३ भागों में विभक्त होकर स्वर्गलोक, मर्त्यलोक तथा रसातल में प्रवहण, पुन: स्वर्ग में चार धाराओं से, मर्त्य में सात धाराओं से तथा रसातल में चार धाराओं से गङ्गा के प्रवहण का कथन ), २.८( शिव जटा में स्थित गङ्गा के एक भाग की गौतम द्वारा अवतारणा होने से गौतमी गङ्गा नाम से प्रसिद्धि तथा द्वितीय भाग की भगीरथ द्वारा अवतारणा होने से भागीरथी नाम से प्रसिद्धि, भगीरथ द्वारा गङ्गा अवतारण तथा स्वपूर्वजों के उद्धार का वृत्तान्त ), २.१०.१६( गङ्गा को लाने हेतु भगीरथ द्वारा लक्ष वर्ष तक तप करने का कथन ) २.१०.२७( भिन्न - भिन्न दिवसों में गङ्गा के दर्शन व स्पर्श का माहात्म्य ), २.१०.६४( गङ्गा के प्रश्न करने पर कृष्ण द्वारा गङ्गा को पापियों के पाप से मुक्त होने के उपाय का कथन ), २.१०.९७( कौथुमी शाखोक्त, भगीरथ - कृत गङ्गा ध्यान का कथन ), २.१०.११४(कौथुमी शाखोक्त, भगीरथ - कृत गङ्गा स्तोत्र का कथन  ), २.१०.११७(गङ्गा के विभिन्न लोकों में दैर्घ्य का कथन), २.११( कृष्ण व गङ्गा के परस्पर सकाम भाव को देखकर राधा का रोष, उपालम्भ, भयभीत गङ्गा के कृष्ण के चरणों में छिपने से चतुर्दिक् जलशून्यता, ब्रह्मा आदि द्वारा राधा को गङ्गा के कन्यात्व का कथन, भयमुक्त गङ्गा का बाहर आना, ब्रह्मा द्वारा कमण्डलु में तथा शिव द्वारा शिर के चन्द्रार्ध भाग में गङ्गा का स्वल्पांश धारण करने का वृत्तान्त ), २.१२( विष्णु के साथ गान्धर्व विवाह तथा गङ्गा के विष्णुपदी नाम के हेतु का कथन ), २.३३( प्रियव्रत के यज्ञ में हिरण्यक नामक दानव के आगमन से भयभीत अग्नि के गङ्गा जल में शरण लेने का उल्लेख ), २.१०२( समुद्र से सङ्गम के लिए सप्तर्षियों के नाम से सप्तधा विभक्त होने का कथन ), ४.३४( शिव संगीत से जन्म, देवनदी, गङ्गा, भागीरथी, जाह्नवी, भीष्मजननी, त्रिपथगामिनी आदि नामों के कारण का कथन तथा माहात्म्य का वर्णन ), ४.१२७( कलियुग में भारत में रहने का कृष्ण के आदेश का कथन ), ब्रह्माण्ड १.२.१३.३५(मेना व हिमवान् पुत्री), १.२.१८.२६( अन्तरिक्ष से अवतरित गङ्गा का शिव की जटाजूट में धारण, भगीरथ द्वारा गङ्गा अवतारण हेतु तप, तप से संतुष्ट महादेव द्वारा गङ्गा का मोचन, मुक्त गङ्गा का नलिनी, ह्रदिनी, पावनी, सीता, चक्षु, सिन्धु तथा भागीरथी नामक सात धाराओं में विभाजन का वर्णन ), २.३.५६.३८( भगीरथ द्वारा गङ्गा के अवतारण तथा स्वपूर्वजों सगर - पुत्रों के उद्धार का वर्णन ), भविष्य २.२.८.१२५( गङ्गा द्वार में महावैशाखी पूर्णिमा के विशेष फल का उल्लेख ), भागवत ४.१.१४( देवकुल्या - कन्या के ही देवनदी गङ्गा के रूप में प्रकट होने का उल्लेख ) , ५.१७( विष्णुपद से उत्पन्न होकर मेरुशिखर पर गिरते समय विष्णुपदी गङ्गा के सीता, अलकनन्दा, चक्षु तथा भद्रा नामक चार धाराओं में विभक्त होने का कथन ), ७.१४.२९( गङ्गा की स्थिति से भारत देश की परम पवित्रता का उल्लेख ), ८.४.२३( गङ्गा की भगवद् रूपता का उल्लेख ), ९.९( दिलीप - पुत्र भगीरथ द्वारा गङ्गा के अवतारण तथा पूर्वजों के स्वर्ग गमन का कथन ), ९.१५.३( जह्नु द्वारा गङ्गा पान का उल्लेख ), मत्स्य १३.३५( गङ्गा तीर्थ में मङ्गला नाम से सती देवी की स्थिति का उल्लेख ), १०६.५०( भूतल पर मनुष्यों, पाताल में नागों तथा स्वर्ग में देवों को तारने से गङ्गा का त्रिपथगा नाम, गङ्गा में अस्थिक्षेप से स्वर्ग लोक में स्थिति, गङ्गा की सर्वत्र सुलभता परन्तु गङ्गा द्वार, प्रयाग व गङ्गासागर सङ्गम में दुर्लभता आदि का कथन ), महाभारत शान्ति ३४७.५०(हयग्रीव की श्रोणी के रूप में गङ्गा सरस्वती का उल्लेख), मार्कण्डेय ५६( गङ्गावतार का वर्णन ), लिङ्ग १.५२.१२( गङ्गा नाम की निरुक्ति : अम्बर से गां /पृथिवी की ओर गता होने से गङ्गा नाम धारण का उल्लेख ), वराह ८२( ८१ सहस्र पर्वतों को तोडती हुई मेरु से पृथ्वी पर गमन /गां - गता / करने से गङ्गा नाम धारण का उल्लेख ), १२५.२४( गङ्गा की निरुक्ति : मन्दाकिनी नदी का गौ को जाना / गां गता ), १३८.१५( मृत खञ्जरीट पक्षी का गङ्गाजल में प्रक्षेपण, गङ्गाचल के प्रभाव से पक्षी का ऐश्वर्य सम्पन्न वैश्य गृह में जन्म लेना ), १४५.८८( शालग्राम क्षेत्र माहात्म्य के अन्तर्गत श्वेत गङ्गा व त्रिशूलगङ्गा की स्थिति का उल्लेख ), वायु ४२( आकाशगङ्गा के अवतरण का वर्णन ), ४२.३९( हिमालय से निर्गता होने के कारण गं गा नाम धारण का उल्लेख ), ४७.२५( गौर पर्वत के पाददेश में स्थित बिन्दुसरोवर पर भगीरथ द्वारा गङ्गा अवतारण हेतु तप, तप से संतुष्ट महादेव द्वारा जटाजूट में निरुद्ध गङ्गा का मोचन, छूटने पर गङ्गा का सात धाराओं में विभक्त होना ), ७७.६८( गङ्गा में सर्वत्र श्राद्ध के अक्षय होने का उल्लेख ), ९१.५४(  जह्नु द्वारा गङ्गा का पान, गङ्गा का जाह्नवी नाम धारण करने का कथन ), विष्णु २.२.३३( विष्णुपाद से नि:सृत गङ्गा के ब्रह्मपुरी में गिरने पर सीता, अलकनन्दा, चक्षु तथा भद्रा नामक चार भागों में विभक्त होने तथा चार दिशाओं में प्रवहण का वर्णन ), २.८.१०८( विष्णु के तृतीय परमपद रूप गङ्गा के माहात्म्य का कथन ), विष्णुधर्मोत्तर १.१९( दिलीप - पुत्र भगीरथ का गङ्गा अवतारण हेतु तप, तप से संतुष्ट गङ्गा का दर्शन देना तथा स्ववेग को सहन करने में पृथ्वी की असमर्थता बतलाते हुए शिव के जटाजूट में अवतरित होने के लिए शिव को प्रसन्न करने के लिए कहना, भगीरथ द्वारा तप से शिव को प्रसन्न करना, जटाजूट में गङ्गा का अवतरण, भगीरथ हेतु गङ्गा का मोचन, सप्त धाराओं में विभक्त होकर गङ्गा का प्रवहण, सप्त धारा का भगीरथ का अनुकरण करते हुए सागर से मिलना तथा पाताल में पहुंचकर सगर - पुत्रों की भस्म को स्वजल से प्लावित करके उनका उद्धार करने का वृत्तान्त ), १.२०( भगीरथ का अनुसरण करते हुए गङ्गा द्वारा राजा जह्नु के यज्ञवाट का प्लावन, क्रुद्ध जह्नु द्वारा योगबल से गङ्गा का पान, मुनिजनों की प्रार्थना पर श्रवण रन्ध्र से गङ्गा का मोचन, दुहिता रूप से स्वीकार करने पर गङ्गा के जाह्नवी नाम धारण का कथन ), १.२१( विष्णु के अङ्गुष्ठाग्र से क्षत ब्रह्माण्ड छिद्र से प्रविष्ट जल के देवनदी रूप होकर विष्णुपदी नाम से प्रथित होने का उल्लेख ), १.२२( ब्रह्माण्ड में प्रवेश करने पर गङ्गा की समस्त वर्षों व द्वीपों में विभिन्न नामों से व्याप्ति का कथन ), १.२९.२( शिव का अङ्गुष्ठ मात्र होकर गङ्गा जल के माध्यम से चन्द्रमा/विष्णु के लोक पहुंचने का कथन ), १.२१५ ( मकर नामक वाहन पर आरूढ होकर गङ्गा द्वारा जनार्दन के अनुसरण का उल्लेख ), १.२२८ ( अग्नि द्वारा शिव वीर्य का गङ्गा में परित्याग तथा गङ्गा द्वारा भी श्वेत पर्वत पर परित्याग का उल्लेख ), १.२२९( वैशाख शुक्ल तृतीया को गङ्गा पूजा के महत्त्व का कथन ), ३.१२१.८( गङ्गा तट पर वासुदेव की पूजा का निर्देश ), शिव १.१२.१० ( गङ्गा शतमुखा का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.४ ( अनसूया के पातिव्रत्य तथा तप से सन्तुष्ट होकर गङ्गा के अत्रि आश्रम में वास का वृत्तान्त ), ४.२६ ( गौतम के तप से संतुष्ट होकर शिव का आविर्भूत होना, गौतम का शिव से गङ्गा की याचना करना, गङ्गा के गौतमी नाम से तथा शिव के त्र्यम्बकेश्वर नाम से गौतम आश्रम में निवास का कथन ), ७.२.४०.६( हिमाचल से निकली गङ्गा के दक्षिणामुखी तथा वाराणसी में उत्तरामुखी होने का उल्लेख ), स्कन्द २.१.३२.४२ ( लोककल्याणार्थ नदी अवतारण हेतु अगस्त्य का तप, ब्रह्मा का आगमन, अगस्त्य की प्रार्थनानुसार ब्रह्मा द्वारा गङ्गा का आह्वान, ब्रह्मा के आदेशानुसार गङ्गा द्वारा स्वांश से नदी की उत्पत्ति, नदी का सुवर्णमुखरी नाम से प्रथित होने का वर्णन ), ३.१.२६ ( गङ्गा यमुना गया तीर्थ माहात्म्य का वर्णन : रैक्व ऋषि की रोग से मुक्ति, जानश्रुति राजा को ब्रह्मज्ञान प्राप्ति ), ३.२.१ ४.१.२७.१२ ( गङ्गा के माहात्म्य का वर्णन ), ४.१.२७.१५६ ( गङ्गा स्तोत्र का कथन ), ४.१.२८ ( गङ्गा में अस्थि क्षेप के माहात्म्य के सन्दर्भ में वाहीक की कथा ), ४.१.२९.१७ ( गङ्गा सहस्रनाम का कथन ), ४.१.४१.१७२( द्युनदी : षडङ्ग योग के देवताओं में से तृतीय ), ४.२.५१.१०१( वाराणसीस्थ गङ्गादित्य तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.२.५८.१७( काशी में असि नदी का गङ्गा से साम्य? ), ४.२.६१.१८० ( गङ्गा केशव तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.२.८४.६७ ( कालगङ्गा तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.२.९१ ( काशीस्थ गङ्गेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.२.९२.६ ( ऋग्वेद का रूप ), ५.१.५४ ( पाप प्रक्षालन से मलिन तथा नील वर्ण गङ्गा का ब्रह्मा के परामर्श से महाकल वन में आकर पवित्र तथा शुक्ल बनना ), ५.२.४२ ( समुद्र से प्राप्त शाप की निवृत्ति हेतु गङ्गा द्वारा महाकालवन में लिङ्ग की आराधना, शाप से मुक्ति, गङ्गेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य ), ५.२.४५.९१( शिव के सिर पर सर्प की मेखला का रूप ? ), ५.२.७१( त्रिपथगा गङ्गा का मानुषी रूप धारण कर शन्तनु की पत्नी बनना, सप्त वसु पुत्रों का गङ्गा में प्रक्षेपण, मनुष्य योनि से मुक्ति हेतु प्रयागेश्वर लिङ्ग पूजा का वर्णन ), ५.३.९.४५ ( गङ्गा, रेवा, सरस्वती में गङ्गा के वैष्णवी मूर्ति होने का उल्लेख ), ५.३.२१.५ ( गङ्गा के कनखल में पुण्या होने का उल्लेख ), ५.३.२५ ( नीलगङ्गा सङ्गम का संक्षिप्त माहात्म्य ), ५.३.५६ ( ब्रह्मादि देवों की प्रार्थना पर शिव द्वारा जटाजूट से गङ्गा का मोचन ), ५.३.८३.१०८( गौ के प्रस्राव में गङ्गा की स्थिति का उल्लेख ), ५.३.९९.४ ( गङ्गा द्वारा गङ्गाजल का भक्षण कर रहे वासुकि नाग को शाप देने का वृत्तान्त ), ५.३.१७८.२४ ( गङ्गावहक तीर्थ का माहात्म्य : गङ्गा द्वारा स्नानार्थियों के पापों से मुक्ति हेतु तप, विष्णु के कर में स्थित शङ्ख का प्लावन करने पर गङ्गा द्वारा पापों से शम् प्राप्ति का वर्णन ), ५.३.१९४.७२ ( नारायण व श्री के विवाह यज्ञ के पश्चात् अवभृथ स्नान हेतु नारायण के पादपङ्कज से गङ्गा के प्रादुर्भाव का कथन ), ६.२ ( शिवलिङ्ग के उत्पाटन से भूतल व पाताल से गङ्गाजल के नि:सृत होने का उल्लेख ), ६.२४.१२ ( बलि निग्रह के समय वामन विष्णु के पादाग्र से ब्रह्माण्ड छिन्न होने पर गङ्गा की उत्पत्ति तथा विष्णुपदी नाम धारण का उल्लेख ), ६.५८ ( भीष्म द्वारा कूपिका में स्थापित गङ्गा में स्नान से पाप मुक्ति का उल्लेख ), ६.१३०.५० ( शिव मूर्धा पर स्थित गङ्गा से पार्वती के ईर्ष्या करने पर शिव द्वारा पार्वती को गङ्गा धारण के हेतु का कथन ), ७.१.११४.५ ( वामन विराट के पादाग्र से ब्रह्माण्ड के भेदन पर विष्णुपदी गङ्गा की उत्पत्ति का उल्लेख ), ७.१.२२९ ( गङ्गा का संक्षिप्त माहात्म्य ), ७.१.२५० ( गङ्गा द्वारा स्थापित गङ्गेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), ७.१.२६७ ( गङ्गापथ में गङ्गेश्वर की पूजा तथा संक्षिप्त माहात्म्य ), ७.१.२८९ ( पाताल गङ्गेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), ७.१.३०४ (तपोरत ऋषियों की प्रसन्नता हेतु शिव द्वारा गङ्गा का आह्वान, गङ्गा में त्रिनेत्र मत्स्यों की स्थिति का कथन ), ७.२.१८.२७५ ( बलि निग्रह के वर्णन में विष्णु पद द्वारा ब्रह्माण्ड के भेदन से गङ्गा की उत्पत्ति का उल्लेख ), ७.३.३८ ( शिव गङ्गा कुण्ड की उत्पत्ति व माहात्म्य : गङ्गा द्वारा पार्वती से एक दिन के लिए शिव के साथ क्रीडा रूप वर की प्राप्ति ), ७.३.६१ ( गङ्गाधर तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य : शिव द्वारा नभ से पतित गङ्गा का धारण ), योगवासिष्ठ ६.१.७६.१५ ( भगीरथ द्वारा पृथ्वी पर गङ्गा अवतारण का उल्लेख ), वा.रामायण १.३७.७ ( आकाशगङ्गा द्वारा अग्नि से प्राप्त रुद्र वीर्य को धारण करना, पश्चात् वीर्य के तेज से संतप्त होने पर उसे हिमालय के पार्श्व में स्थापित करने का उल्लेख ),१.४३ ( शिव द्वारा गङ्गा का जटाओं में धारण, जटा से निर्गम के पश्चात् सात धाराओं में विभाजन, जह्नु द्वारा पान, पुन: उत्पत्ति तथा जाह्नवी, भागीरथी, त्रिपथगा नाम धारण की कथा ), हरिवंश २.८१.२६ ( गङ्गा व्रत विधि का कथन ) लक्ष्मीनारायण १.८३.५८( गङ्गादित्य : काशी में दिवोदास के राज्य में स्थित १२ आदित्यों में से एक ), १.१०७.३२ ( गृह में गृहिणी के गङ्गा होने का उल्लेख ), १.१४६.८६ (विष्णु के पादाङ्गुष्ठ से ब्रह्माण्ड कटाह के भेदन से गङ्गा की उत्पत्ति, गङ्गा का मेरु शिखर पर पतन, पुन: शिव द्वारा जटाओं में धारण, भगीरथ तथा गौतम के प्रयास द्वारा पृथ्वी पर आगमन, भागीरथी व गौतमी नाम धारण करने का कथन ), १.२०७.२४ ( गन्धर्मादन पर्वत पर तपोरत गरुड द्वारा श्रीहरि की पूजार्थ गङ्गा का आवाहन, पञ्चमुखी गङ्गा का आविर्भाव, गङ्गा जल से गरुड द्वारा हरिपूजा का उल्लेख ), १.३३२.५ ( कृष्ण - पत्नियों गङ्गा व सरस्वती में रति निमित्तक कलह, परस्पर शापवश दोनों की सरित् रूपता का निरूपण ), २.१११.५९ ( अजनाभ में गङ्गा के गोलोक वास प्रदायिका होने का उल्लेख ), २.१६५.७८ ( श्रीहरि के केतुमाल में गमन पर गङ्गा के ६० पुत्र - पुत्रियों द्वारा श्रीहरि का स्वागत, वृकायनादि ऋषियों के गाङ्गेयों से मिलन का कथन ), २.१६६.५ (श्रीहरि द्वारा गङ्गा को २८ पुत्रियां, पुन: ५ कुमार, पुन: ४ कुमार, पुन: २० बालक, पुन: ३ अपत्य प्रदान करना, ६० गाङ्गेयों के नामों का कथन ), २.२३०.१६ ( भगीरथ द्वारा गङ्गा अवतारण की कथा का पाराक राजर्षि द्वारा आम्रजनी नदी के अवतारण से साम्य ), २.२९७.८६( गङ्गा द्वारा स्वगृह में कृष्ण के पाद संवाहन के विशिष्ट कार्य का उल्लेख ), ४.३१.२ ( गङ्गाजनी नामक शूद्री की सज्जनों के  संयोग से मुक्ति की कथा ), ४.८०.१८( राजा नागविक्रम के यज्ञ में गाङ्गेय विप्रों के वेद व्याख्याकार होने का उल्लेख ), ४.१०१.८७ ( कृष्ण - पत्नी गङ्गा के पुत्र - पुत्री युगल का नामोल्लेख ), कथासरित् १२.७.१३१ ( मित्र वियोग से पीडित भीमभट के गङ्गा में कूदने हेतु उद्यत होने पर गङ्गा का साक्षात् प्रकट होना तथा मित्र मिलन के आश्वासन के साथ भीमभट को अनुलोम तथा प्रतिलोम विद्याएं प्रदान करने का कथन ); द्र. कृष्णगङ्गा, नीलगङ्गा, पातालगङ्गा, रत्नगङ्गा, त्रिशूलगङ्गा, बाणगङ्गा, श्वेतगङ्गा । gangaa/ganga

Self realization through story of Ganga

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Mantra for worship of Ganga

गंगा दशहरा गरुड १,२१३.५६( ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को दस पापों के हरण का कथन), नारद १.११९.८ (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी : दशहरा लग्न हेतु दश योग, दस पाप हरण से दशहरा नाम, जाह्नवी में स्नान का महत्त्व), 2.40.21(गंगा अवतरण का काल), २.४३.४२ (गङ्गा दशहरा : ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, गङ्गा पूजा विधि), पद्म ५.८५.४( मानसिक, वाचिक व कायिक भक्तियों का कथन), स्कन्द ४.१.२७.१३५ (गङ्गा दशहरा स्तोत्र व माहात्म्य), ४.१.२७.१५६ ( गङ्गा दशहरा स्तोत्र का कथन ), ४.२.५२.९० (दशहरा तिथि को दशाश्वमेध तीर्थ में स्नान का माहात्म्य), लक्ष्मीनारायण १.२७५.५(ज्येष्ठ शुक्ल दशमी का गङ्गा दशहरा नाम ) । ganga duserra/dashahara/dussera

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