पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From vowel Ekapaatalaa to Ah)

Radha Gupta, Suman Agarwal and Vipin Kumar

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Ekapaatalaa - Ekashruta (  Ekalavya etc.)

Ekashringa - Ekaadashi ( Ekashringa, Ekaadashi etc.)

Ekaananshaa - Airaavata (  Ekaananshaa, Ekaamra, Erandi, Aitareya, Airaavata etc.)  

Airaavatee - Odana  ( Aishwarya, Omkara, Oja etc.)

Oshadhi - Ah ( Oshadhi/herb, Oudumbari, Ourva etc.)

 

 

 

INTRODUCTION

 

Oshadhi or herb is a frequently talked-about subject of Rigveda and especially of Atharva veda. In common parlance, herb is considered as one which can cure from any ailment. But in vedic literature, oshadhi has got much deeper meanings. Common herbs of the world grow on the worldly earth, but the herbs of vedic literature grow on the earth of self or atman. As will be the quality of self due to our deeds, the same type of herb will grow on that. One can call buddhi or intellect to represent oshadhi. From the adjectives given to herbs in vedic mantras, it appears that the herbs may be divided into five categories according to our five senses. Some herb will improve our power of seeing, some of hearing etc. Puraanic literature abounds with references of herbs which have luminescent properties.

 Vedic and puranic literature has categorized herbs mainly into 2 parts Ė those which grow wild and those which are sown. This indicates that there may be two parts of atman Ė one which can not be ploughed and one which can be ploughed by our efforts. The number of herbs in these two categories in different in vedic and puranic literature.

   The word meaning of oshadhi can be derived on the basis of  root ush Ė burning. But the herbs in puranic literature are considered as the wives of moon who, instead of burning, gives coolness. In terms of terminology of modern sciences, coolness may be called the decrease in entropy, or  increase in order. The term entropy has further been clarified in detail in the text. This indicates that oshadhi has got connection with sun and moon both. When one is in trance, then oshadhi will work, because this is the state of least entropy. When one comes out of trance, then Usha will work, just like the usha or dawn in outer world.

          There is much confusion about the difference between the words vanaspati and oshadhi or tree and herb in vedic and puranic literature. It has been clarified that vanaspati may be connected with love or emotion part, while oshadhi may be connected with intellectual or knowledge part

 

First written in 1999 AD( Vikrami 2056)

टिप्पणी : अथर्ववेद के कईं सूक्तों की देवता ओषधि है । ओष अर्थात् जलाना । यह उषा से बना है । ओष को , प्रकाश को धारण करने वाली ओषधि कहलाती है - वह बुद्धि या चेतना शक्ति जो ज्ञान से निकलती है, जिससे हम सब कुछ देखते हैं ।

          'ओषधि शब्द का निर्वचन सायण ने 'ओष+ धी ' करके एक महत्त्वपूर्ण दिशा दी है । वेद - विज्ञान में बहुवचनान्त 'ओषधयः शब्द उन आध्यात्मिक शक्ति धाराओं का द्योतक है जिन्हें क्षिप्रगामी ज्ञानाग्नि धाराएं कहा जा सकता है । दाहबोधक 'उष' धातु से निष्पन्न वैदिक उषा शब्द इन्हीं ज्ञानाग्निधाराओं या ज्ञानरश्मियों आदि का एकीभूत रूप है । निघण्टु में ओषधयः को पदनामों में संकलित करके यह संकेत दे दिया गया है कि उक्त उषा रूप ही वाक् शक्ति के उन नौ पदों / स्तरों में व्यक्त होता है जिनका संकेत वाक् के 'नवपदी ' स्वरूप ( ऋ.१.१६४. ) में प्राप्त होता है । इन्हीं नव पदों को लक्ष्य करके निघण्टु ने पदानि नाम देकर लगभग २०० शब्दों को नौ खण्डों में विभक्त किया है ।। इस संदर्भ में यह भी स्मरणीय है कि इन नौ खण्डों में से एक में अग्निः, जातवेद: और वैश्वानर: ही हैं, जो निस्सन्देह पूर्वोक्त उस ज्ञानाग्निधारा के ही द्योतक हैं  जो उषा कही जाती है और जिसे अनेक उषाओं अथवा ओषधियों के रूप में भी देखा गया है ।

          उक्त मूल उषा या ओषधि को जिस प्रकार अनेक रूप ग्रहण करने वाली एक रश्मि कहा जाता है , उसी प्रकार वनस्पति शब्द में रश्मि बोधक 'वन' का रूप कल्पित होकर पुन ' वनस्पतयः ' रूप में अनेक रश्मियों का सूचक है । इसी दृष्टि से, ओषधयः और वनस्पतयः कभी कभी साथ- साथ भी प्रयुक्त होते हैं । इससे स्पष्ट है कि दोनों रश्मि रूप होते हुए भी, एक दूसरे से भिन्न हैं । इस भिन्नता की दृष्टि से, वनस्पति के मूल में इच्छा अथवा भावना शक्ति बोधक ' वन ' धातु है , जबकि ओषधि के मूल में दाहार्थक 'उष ' धातु है  । अतः वनस्पति जहां भावना प्रधान गति वाली रश्मियां कही जा सकती हैं , वहीं ओषधियों को ज्ञान प्रधान गति वाली रश्मियां ' कहा जा सकता है । अपने एकीभूत रूप में वनस्पति वह भावरश्मि है जो निर्विकल्प समाधि का कारण बनती है, जबकि ओषधि ज्ञानप्रधान सविकल्प समाधि का कारण बनती है । अतःअथर्ववेद में ओषधि को आसुरी शक्ति को जीतकर वनस्पति रूप रस वाला बताया गया है । उक्त आध्यात्मविज्ञान की दृष्टि से ओषधियों और वनस्पतियों में जो भेद है, उसी के प्रतीक स्वरूप कर्मकाण्ड में भौतिक ओषधियों और वनस्पतियों का प्रयोग हुआ है ।

          अथर्ववेद १.२४.४ में पृथिवी से उद्भूत सरूपा नामक ओषधि को सरूपकरणी कहा गया है और फिर उसे 'ॐ सु ' ब्रह्म ( पदपाठ रूप ) की साधना करके जिन विभिन्न रूपों को ग्रहण करने वाली बताया गया है , उन्हीं रूपों में उसे पूर्वमन्त्र ( १.२.१ ) में रामा, कृष्णा और असिक्नी ( क्रमशः सत्त्व, रज और तम की दृष्टि से ) कहा गया है । दूसरे शब्दों में, स्थूल स्तर पृथिवी से ' ॐ सु ' ब्रह्म की साधना के साथ जो चेतना धारा या रश्मियां चलती हैं, वे त्रिविध रूप धारण करती हुई अन्त में वनस्पति ( भावसमाधि ) रूप में परिणत होती हैं । इसी दृष्टि से केनोपनिषद में ब्रह्म के ' तद् वनम् ' इति उपासीत का उपदेश है ।'

- फतहसिंह २२-५-१९९९

 

          डा. फतहसिंह ने ओषधि को प्रकाश या ज्ञान से प्राप्त बुद्धि, चेतना कहा है । यह कथन महाभारत वनपर्व ६१.२९ के कथनों से मेल खाता है जहां सब दु:खों में भार्या के अप्रतिम ओषध होने का उल्लेख है । महाभारत शान्ति पर्व २०६.५ में बीज से उत्पन्न ओषधि की तुलना कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न बुद्धि से की गई है । इसका अर्थ यह हुआ कि बुद्धि को सामान्य रूप से ओषधि कहा जा सकता है, चाहे वह अच्छे कर्मों के फलस्वरूप अमृतमय बुद्धि हो या बुरे कर्मों के फलस्वरूप विषतुल्या बुद्धि । भौतिक रूप में ओषधि पृथिवी पर उत्पन्न होती है । आध्यात्मिक रूप में ओषधि आत्मा रूपी पृथिवी से उत्पन्न होती है । लेकिन वैदिक साहित्य में ओषधि के २ रूप हैं - अकृष्टपचच्या व कृष्टपच्या - बिना जोते व जोतने से उत्पन्न । सामान्य शब्दों में अरण्य में उत्पन्न होने वाली ओषधि को अकृष्टपच्या तथा ग्राम में उत्पन्न होने वाली को कृष्टपच्या कहा जा सकता है । लेकिन शतपथ ब्राह्मण ७.२.४.२३ तथा जैमिनीय ब्राह्मण २.५४ से संकेत मिलता है कि आत्मा से उत्पन्न ओषधि अकृष्टपच्या है । आत्मा आकाश की भांति है जिसका कर्षण नहीं किया जा सकता, जिस पर हल नहीं चलाया जा सकता । वैदिक तथा पौराणिक साहित्य में हल चलाने का कार्य, पृथिवी के विदारण का कार्य प्राण करते हैं । अतः आत्मा के स्थूल रूप और प्राणों के संयोग से उत्पन्न ओषधि को कृष्टपच्या कहा जा सकता है । शतपथ ब्राह्मण ५..३.३.८ में कृष्टपच्या ओषधियों को वारुणी कहा गया है । वरुण सत्यानृत के विवेक से कार्य करता है । अतः यहां कर्म प्रधान है । इस आधार पर अकृष्टपच्या ओषधियों को मैत्र प्रकार का कहा जा सकता है ।। मित्र देवता का कार्य माता की तरह सदैव मैत्रीभाव रखना है । तैत्तिरीय आरण्यक ४.११.८, ४.४२.४, ५.९.११ तथा तैत्तिरीय संहिता १.४.४५.२ में भी ओषधियों के हमारे लिए सुमित्र बनने और शत्रुओं के लिए दुर्मित्र बनने की प्रार्थना की गई है । ऋग्वेद ६.१९.५, ७.५०.३ में कामना की गई है कि ओषधियों में जो विष उत्पन्न होता है, विश्वे देवा उसका सुवन कर दें।

अथर्ववेद १०.४.२१ १०.४.२२ में कामना की गई है कि अहि ओषधियों के विष का हरण कर लें। तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.१.२ में पितरों द्वारा रुष्ट होने पर तथा ताण्ड्य ब्राह्मण ६.९.९ में महादेव के रुष्ट होने पर ओषधियों का विष से लेपन करने का उल्लेख है । विष निवारण के लिए उन्हें संतुष्ट करना पडता है । स्पष्ट है कि वैदिक साहित्य का मानना है कि भौतिक शरीर तक में भी जो रोग उत्पन्न हुआ है, वह बुद्धि रूपी ओषधि के, हमारी भार्या के विषाक्त हो जाने से उत्पन्न हुआ है । लेकिन वैदिक साहित्य की ओषधि केवल भौतिक शरीर तक ही सीमित नहीं है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, यह पांच तन्मात्राएं कहलाती हैं । हमारे व्यक्तित्व में इन तन्मात्राओं के दिव्य बनने में जो भी न्यूनता है, वह ओषधि रूपी बुद्धि के विषाक्त होने से है । वैदिक निघण्टु में ओषधि को पद नामों के अन्तर्गत रखा गया है । यह पद कौन से हैं , इसकी सम्यक् व्याख्या अपेक्षित है । ओषधि इन पांच तन्मात्राओं से सम्बद्ध हो सकती है, इसके कुछ संकेत पुराणों व वैदिक साहित्य से मिलते हैं । महाभारत कर्ण पर्व ३४.२६ में ओषधियां शिव के रथ में घण्टा बनती हैं । अथर्ववेद ११.६.३-६ में प्राण स्तनयित्नु है तो ओषधियां क्रन्दन करती हैं । स्पर्श तन्मात्रा का प्रत्यक्ष उल्लेख दृष्टिगोचर नहीं होता । रूप तन्मात्रा के संदर्भ में वैदिक साहित्य में विस्तृत वर्णन उपलब्ध होते हैं । ओषधियों को वैदिक मन्त्रों में विश्वरूपा कहा गया है ( ऋग्वेद ५.८३.५, अथर्ववेद ६.५९.३ ) । अथर्ववेद १.२४.३ व ४ में ओषधि को सरूपा कहा गया है । यह रूप किस प्रकार का है । जैसा कि डा. फतहसिंह ने अपनी टिप्पणी में उद्घाटित किया है, ओषधि शब्द ओष, प्रकाश से बना है । ओषधियां स्वयं प्रकाशमान हैं । उन्हें देखने के लिए बाहर से प्रकाश की आवश्यकता नहीं पडती, अपितु वह अपने प्रकाश से दूसरों को रूप प्रदान करती हैं । अथर्ववेद ४.२०.२ में ओषधि की सहायता से सब भूतों को देखने की कामना की गई है। यह सूक्त सम्यक् पश्यन्ती योग के लिए है जो आजकल प्रचलित विपश्यना ध्यान साधना का वैदिक मूल है । वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से ( अथर्ववेद ९.१२.१५, तैत्तिरीय संहिता ७.५.१७.१, ऐतरेय ब्राह्मण ५.२३, ऐतरेय आरण्यक ५.१.१ ) ओषधियों को पृथिवी के लोम/रूप कहा गया है । सामान्य रूप से द्युलोक में दिखाई पडने वाले नक्षत्र रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं । लेकिन यह भी उल्लेख आता है कि पृथिवी पर जो कुछ भी दिखाई देता है , नगर, ग्राम आदि, वह सब नक्षत्रों का रूप है । अगली तन्मात्रा रस का तो वैदिक साहित्य में बहुत ही अधिक वर्णन है । अथर्ववेद ३.३१.१०, ४.१५.२, ४.२७.२, १९.३१.५ आदि में ओषधियों के रस का उल्लेख है । वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से (शतपथ ब्राह्मण ३.६.१.७, ३.७.४.४, ४.४.५.२०, ७.२.३.४, १२.८.१.४, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.२.३.६, तैत्तिरीय आरण्यक २.११.१ तैत्तिरीय संहिता २.४.९.३, ऐतरेय ब्राह्मण ८.८ आदि में ) आपः और ओषधियों के रसों के एक दूसरे से सहयोग करने का उल्लेख आता है । इस सहयोग से अन्नाद्य , अर्थात् दधि, मधु, आज्य की प्राप्ति होती है । तैत्तिरीय संहिता २.१.९.२ का कथन है कि ओषधि मैत्र है जबकि आपः वारुण हैं । ऐतरेय आरण्यक ५.१.१ में कहा गया है कि आपः की भांति रस और ओषधि की भांति रूप प्राप्ति हो । इस आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि ओषधि यदि आपः से संयोग करेगी तो रस और अन्न उत्पन्न होंगे और यदि वायु से, प्राण से संयोग करेगी तो रूप उत्पन्न होगा क्योंकि रूप वायु में होता है । अगली तन्मात्रा गन्ध के संदर्भ में कुछ उल्लेख ( अथर्ववेद ८.६.१०, गोपथ ब्राह्मण १.२.२ आदि ) मिलते हैं । अथर्ववेद २.२७.२ ५.१४.१ में सूकर द्वारा नाक की सहायता से ओषधि के खनन का उल्लेख है । गोपथ ब्राह्मण १.२.२ का कथन है कि ब्रह्मचारी में पुण्य गन्ध की उत्पत्ति ओषधि से ही होती है

          लिङ्ग पुराण १.७०.२३९ आदि में ब्रह्मा के रोमों से ओषधियों की उत्पत्ति का उल्लेख है । वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से पृथिवी, गौ, सार्पराज्ञी, ऋक्षा, अश्व आदि के लोमों को ओषधि - वनस्पति कहा गया है ( अथर्ववेद ९.१२.१५ ( गौ के लोम ), तैत्तिरीय संहिता ७.४.३.१ ( ऋक्षा द्वारा लोम रूपी ओषधियों की प्राप्ति ), तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.४.५ ( अलोमका ऋक्षा द्वारा अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र की सहायता से लोम रूपी ओषधि प्राप्ति ), ऐतरेय ब्राह्मण ५.२३ ( सार्पराज्ञी द्वारा पृश्नि रूप धारण करने पर लोम ओषधि प्राप्ति ), तैत्तिरीय संहिता ७.५.२५.१ ( अश्व के लोम ) ) । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१०.८.७,ऐतरेय आरण्यक २.४.१ व २.४.२, गोपथ ब्राह्मण १.५.३ तथा जैमिनीय ब्राह्मण २.५४ में मनुष्य के लोमों को ओषधि कहा गया है । रोम या लोम क्या हैं , इसका संकेत हमें रोमहर्षण सूत से मिल सकता है । किसी भय के अथवा हर्ष के उपस्थित होने पर रोम हर्षित हो जाते हैं । लेकिन यह रोम ऐसी बुद्धि में कब रूपान्तरित हो सकते हैं जो ओषधि हो, यह अन्वेषणीय है । स्थूल रूप में, टेपरिकार्डर तथा कम्प्यूटर की फ्लांपी डिस्क आदि में स्मृति के भण्डारण के लिए चुम्बकीय गुण वाले लोम रूपी तन्तुओं को जमाया जाता है । लोमों में प्रायः यह विशेष गुण होता है कि एक लोम का चुम्बक दूसरे लोम के चुम्बक के साथ टकराव नहीं करता, सभी लोमों में अपना स्वतंत्र चुम्बकीय क्षेत्र होता है । अतः प्रत्येक लोम पर किसी विशेष सूचना का भंडारण किया जा सकता है । यदि लोमों का चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर टकराने लगे तो सारी सूचनाएं परस्पर टकराकर नष्ट हो जाएंगी । लोमों पर स्थित चुम्बकीय क्षेत्र के पठन के लिए एक चुम्बक इनके ऊपर रखा जाता है जिसे हैड कहते हैं । चेतना के क्षेत्र में लोम रूपी बुद्धि या ओषधि का पठन करने वाला मन हो सकता है ।

          हरिवंश पुराण १.२५.१६ व स्कन्द पुराण ४.१.१४.२३, ५.१.२८.७२, ७.१.२०.६० में सोम द्वारा पृथिवी के चक्कर लगाने से पृथिवी पर पतित तेज से ओषधियों के उत्पन्न होने की कथा आती है । प्रसिद्ध पुरुष सूक्त ( ऋग्वेद १०.९०.१३ ) के अनुसार पुरुष के मन से चन्द्रमा का उदय हुआ । यदि सोम, चन्द्रमा और मन को एक ही मानें तो यह कहा जा सकता है कि यदि मन ब्रह्माण्ड में न दौडे, इस शरीर रूपी पृथिवी तक ही सीमित हो जाए, अन्तर्मुखी हो जाए, तो इसके तेज से ओषधि उत्पन्न हो सकती है । विद्युत के विज्ञान में यह सर्वविदित है कि जब कोई विद्युत आवेश चक्र के रूप में घूमता है तो उसके केन्द्र पर एक बल उत्पन्न हो जाता है जिसका आजकल मोटर, पंखों आदि में बहुत उपयोग किया जाता है ।

          ब्रह्म पुराण २.५०.१ आदि में सोम व ओषधियों के वार्तालाप का वर्णन मिलता है जिसका मूल ऋग्वेद १०.९७.२२ में द्रष्टव्य है। लौकिक रूप में कहा जाता है कि लुकमान हकीम से ओषधियां वार्तालाप करती थी । अथर्ववेद में सोम और ओषधियों के वार्तालाप का उल्लेख आता है । ऋग्वेद १०.९७.६ व  तैत्तिरीय संहिता ४.२.६.२ में ओषधियों व सोम की तुलना राजा और उसकी समिति से की गई है । डा. फतहसिंह के अनुसार सभा में सदस्यों के विचार भिन्न - भिन्न हो सकते हैं, लेकिन समिति में सबके एक से विचार होते हैं ।

          पुराणों में १७ ग्राम्य व १४ आरण्यक ओषधियों के नामों के सार्वत्रिक उल्लेख के संदर्भ में, वैदिक साहित्य में तैत्तिरीय संहिता ४.२.६,  ७.३.४.१ आदि में केवल ७ ग्राम्य और ७ आरण्यक ओषधियों का उल्लेख मात्र आता है, उनके नामों का उल्लेख केवल सायणाचार्य ने अपनी टीका(तै.सं. ४.२.६.६) में किया है(तिलमाषव्रीहियवाः प्रियङ्ग्वणवो गोधूमाश्चेति सप्त ग्राम्या ओषधयः। वेणुश्यामाकनीवारजर्तिला गवीधुका मर्कटका गार्मुताश्चेति सप्तारण्याः ओषधयः (द्र. आप.श्रौ. १६.१९.१३) आपस्तम्ब श्रौतसूत्र का यह भी कथन है कि ग्राम्य ओषधियां कृष्ट हैं, आरण्यक अकृष्ट।  ब्रह्माण्ड पुराण में कहा गया है कि ७ ग्राम्य व ७ आरण्यक ओषधियां अकृष्टपच्या हैं ,जबकि १७ ग्राम्य व १४ आरण्यक ओषधियां कृष्टपच्या हैं । इन ओषधियों के नामों का क्या निहितार्थ हो सकता है, यह अन्वेषणीय है । पृथिवी रूपी गौ के दोहन से ओषधियों की उत्पत्ति के पुराणों के सार्वत्रिक उल्लेख के संदर्भ में, अथर्ववेद ८.११.७ में विराज गौ के चार स्तनों में से रथन्तर स्तन से देवों द्वारा इन्द्र को वत्स बनाकर ओषधि दोहन का उल्लेख है । यह कल्पना की जा सकती है कि गौ के दोहन द्वारा जो ओषधियां प्राप्त होंगी, वह कृष्टपच्या ओषधियों की श्रेणी में आएंगी जहां प्राण द्वारा कर्षण किया गया है । ब्राह्मण ग्रन्थों में गौ को वाक्, प्राण, इन्द्रिय, यज्ञ आदि कहा गया है ( मैत्रायणी संहिता ४.२.३, शतपथ ब्राह्मण ४.३.४.२५, मैत्रायणी संहिता ३.११.४, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.९.८.३ ) । प्रश्न यह है है कि ओषधि दोहन के लिए पुराणों ने गौ को ही क्यों चुना, अजा व अवि को क्यों नहीं ? साम या भक्ति में अजा, अवि, गौ व अश्व क्रमशः हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ व प्रतिहार भक्तियों के प्रतीक हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि अजा व अवि स्तरों में पाप विद्यमान है । यह तो ओषधि या बुद्धि की वर्तमान अवस्था को उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं । जो भैषज्य कर्म वाली ओषधि होगी, उसका गौ से दोहन करना पडेगा । गौ के शरीर में सारे देवों का वास होता है  । जहां गौ है, वहां असुर टिक ही नहीं सकते ।

          वाल्मीकि रामायण में द्रोण, चन्द्र  (६.५०.३०) व महोदय पर्वतों (६.१०१.३१) पर दिव्य ओषधियों की उत्पत्ति का उल्लेख आता है । इनमें से द्रोण पर्वत के संदर्भ में , कर्मकाण्ड में हविर्धान मण्डप में सोमरथ के अग्रभाग में दशापवित्र नामक छलनी बांधकर उसमें से सोमरस को छाना जाता है । छने हुए सोम को द्रोणकलश में एकत्र किया जाता है । यह पात्र उदुम्बर काष्ठ का बना होता है तथा इसका मुख ॐ के आकार का होता है । इस पात्र में से फिर अन्य पात्रों में सोम भरा जाता है । जैमिनीय ब्राह्मण १.३५५ में सुपर्ण का आख्यान आता है । सुपर्ण जब स्वर्ग से सोम का आहरण कर रहा था, उसकी कुछ बूंदें पृथिवी पर गिर पडी । वहां ओषधियां उत्पन्न हुई । सोमकलश जिसका सुपर्ण आहरण कर रहा था, द्रोण कलश हो सकता है । द्रोणकलश में ही सोम रस सबसे शुद्ध अवस्था में रहता है । पुराणों व ब्राह्मणों में ओषधियों का उत्पत्ति स्थान पर्वतों पर होना एक और पहेली है । शतपथ ब्राह्मण ३.४.३.१३ ४.२.५.१ के अनुसार इन्द्र ने वृत्र का हनन किया । उसका जो सोम रूपी शरीर था, वही पर्वत बना । उस पर अशाना/उशाना नामक ओषधियां उत्पन्न हुई । ऋग्वेद १.५९.३ १.१०८.११ में पर्वत व ओषधि शब्द साथ - साथ प्रकट हुए हैं । डा. फतहसिंह का कहना है कि अमर्त्य स्तर पर भक्ति का प्रतीक नारद है तो मर्त्य स्तर पर पर्वत ।

          ओषधि के संदर्भ में वैदिक साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे अधिक अस्पष्ट पहलू ओष शब्द है  । ओषधि शब्द की निरुक्ति इस प्रकार की जाती है कि ओषम् दधाति इति , जो ओष को धारण करे । ऋग्वेद १.१३०.८ (ओष ), १.१७५.३ (ओष ), १०.११९.१० (ओष ), अथर्ववेद २.३६.१ (ओष ), ७.७७.६ (ओष ), १२.३.३१ (ओष ), १२.१०.८ ( ओष ), १२.११.११ ( ओष ), १२.११.१२, १९.२९.७ ( ओष, ४ बार ), शतपथ ब्राह्मण १.९.३.२ आदि में ओष शब्द प्रकट हुआ है और सायण द्वारा इसका अर्थ दाह किया गया है, जो शत्रुओं का दाह करे । लेकिन अथर्ववेद १०.२९.७ में शत्रुओं के लिए ओष और दह का साथ- साथ प्रयोग किया गया है । हिन्दी भाषा में रात में बरसने वाले जल को ओस कहते हैं जो शीतल माना जाता है । आटा जल डालकर ओसना जाता है । वैदिक निघण्टु में ओषम् क्षिप्र नामानि के अन्तर्गत है । यह उल्लेखनीय है कि वैदिक मन्त्रों में ओष शब्द २ प्रकार से प्रकट हो रहा है - ओ अनुदात्त  व ओ उदात्त । शतपथ ब्राह्मण १.९.३.२ से संकेत मिलता है कि ओष के यह २ रूप देवयान व पितृयान पथों से सम्बन्धित हो सकते हैं । ओषधि शब्द वेद में जिस रूप में प्रकट हो रहा है , उसमें ओ उदात्त है । आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से ओष को उषा शब्द से , अव्यवस्था के माप से , एन्ट्रांपी से सम्बद्ध किया जा सकता है जिसके लिए उषा शब्द पर टिप्पणी पठनीय है । बौधायन श्रौत सूत्र २१.१२ में उषसा नामक ओषधि का उल्लेख है । शतपथ ब्राह्मण ६.५.४.४ में ओषधि, जिसे देवों की पत्नी कहा गया है, उखा को पृथिवी पर रखती है । उखा भी उषा का रूप है । यह उल्लेखनीय है कि उषा मुख्य रूप से सूर्य से सम्बन्धित है , जबकि ओषधि चन्द्र या सोम से । उषा सूर्य की पत्नी है जबकि ओषधियां चन्द्रमा की पत्नियां हैं । सूर्य उष्ण है जबकि चन्द्रमा शीतल । आधुनिक भौतिक विज्ञान के तापगतिकी के दूसरे नियम को यदि हृदयङ्गम कर लिया जाए तो सूर्य और चन्द्रमा के अस्तित्व को समझने में सहायता मिल सकती है । भौतिक विज्ञान का यह सिद्धान्त किसी वस्तु में कितनी अव्यवस्था है, इसके मापन से सम्बन्धित है । यह अव्यवस्था आयतन के सापेक्ष हो सकती है , सूचना या ज्ञान या चेतना के सापेक्ष हो सकती है, आदि आदि । आयतन के सापेक्ष अव्यवस्था को इस प्रकार समझा जा सकता है कि मान लिया जाए कि एक पशु को केवल उसके पिंजरे में ही घूमने की स्वतन्त्रता है जबकि दूसरे पशु को पूरे जंगल में घूमने की स्वतन्त्रता है तो दूसरे पशु में अधिक अव्यवस्था है । इस अव्यवस्था के सम्यक् मापन को भौतिक विज्ञान में एण्ट्रांपी नाम दिया गया है । सूचना के क्षेत्र में, इस प्रकार कहा जाता है कि किसी वस्तु के बारे में जितनी सूचना हमें ज्ञात है और जितनी अज्ञात है, उसमें अज्ञात सूचना की मात्रा अव्यवस्था का, एण्ट्रांपी का मापक है । अज्ञात सूचना जितनी अधिक होगी, एण्ट्रांपी उतनी ही अधिक होगी । इसके विपरीत, जितनी अधिक सूचना ज्ञात होगी, एण्ट्रांपी उतनी ही कम होती जाएगी । जब ऊर्जा या ऊष्मा के सापेक्ष एण्ट्रांपी पर विचार करना होता है तो किसी पदार्थ में ऊर्जा और तापमान का अनुपात क्या है, इस पर एण्ट्रांपी निर्भर करती है । भौतिक संसार में वर्तमान ओषधियों के बारे में विचार करे तो ओषधियां सूर्य से प्राप्त तेज से अपने भोजन का निर्माण करती हैं जिसे प्रकाश संश्लेषण, फोटोसिन्थेसिस कहा जाता है । कोसानजो व रुबिनो (न्युओवो सिमेण्टो  ग्रंथ५३,संख्या१,पृष्ठ४५ सितम्बर१९७९ )के अनुसार ओषधि प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपने लिए उन्हीं रासायनिक पदार्थों का निर्माण करती है जिनकी एण्ट्रांपी न्यूनतम होती है । ऊर्जा संतुलन रखने के लिए उच्चतर एन्ट्रांपी वाले जिन पदार्थों का निर्माण होता होगा, उनका अन्य किसी प्रकार से क्षय हो जाता होगा । इसका निहितार्थ यह भी ले सकते हैं कि ओषधि जो फल उत्पन्न करती है , वह न्यूनतम एन्ट्रांपी की वस्तु है, सबसे अधिक व्यवस्थित वस्तु है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि ओषधि जो व्यवस्था उत्पन्न करती है , वह चन्द्रमा से संबंधित है और ओषधि जो अव्यवस्था उत्पन्न करती है , वह सूर्य से । तापगतिकी के नियम के अनुसार यदि तापमान में वृद्धि की जाती है तो एन्ट्रांपी में , अव्यवस्था में भी वृद्धि ही हो सकती है, ह्रास नहीं । अतः चन्द्रमा की स्थिति को, शीतल स्थिति को प्राप्त करने के लिए एन्रांपी में ह्रास होना चाहिए ।  रामायण में उल्लेख आता है कि राम और लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करने के लिए ओषधि का ग्रहण उषा काल होने से पूर्व ही होना चाहिए । उषा के लिए उषा शब्द की टिप्पणी में कहा गया है कि उषा समाधि अवस्था से जागने पर उत्पन्न हुई अव्यवस्था का प्रतीक है, अथवा समाधि से जागने के लिए उषा रूपी अव्यवस्था को उत्पन्न करना आवश्यक है । इसके विपरीत सोचें तो समाधि में जाने के लिए अव्यवस्था को कम करना आवश्यक है । क्या कोई ओषधि इस अव्यवस्था को कम कर सकती है ? स्थूल शरीर के सम्बन्ध में विचार करे तो आजकल की ओषधियों को २ वर्गों में बांटा जा सकता है । एक वर्ग तो वह जो शरीर की कोशिकाओं की सृजन क्रिया को रोकता है । इस वर्ग में एण्टीबायोटिक ओषधियां आती हैं । कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करने के लिए भी एक विष ओषधि द्वारा समस्त शरीर की कोशिकाओं का सृजन कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है , यहां तक कि केश भी झड जाते हैं । यह अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर जाने की , समाधि की ओर जाने की प्रक्रिया का प्रतीक है । दूसरी ओर, ऐसी ओषधियों का सेवन जिससे शरीर में वृद्धि हो, अव्यवस्था की ओर जाने का प्रतीक है । अथर्ववेद १.२३.१ में ओषधि को रात्रि में उत्पन्न कहा गया है ।

          अथर्ववेद १.२४.४ में ओषधि के साथ ऊ सु शब्दों का प्रयोग हुआ है । ऋग्वेद १.१३९.७, ३.३३.९, ७.५९.७, ८.२.१९, ८.७.३३ में प्रकट ओषु व मोषु के साथ ओष शब्द की तुलना विचारणीय है । डा. फतहसिंह के अनुसार ओषु व मोषु चेतना की अन्तर्मुखी व बहिर्मुखी धाराएं हैं । उनका यह भी कहना है कि श्री रजनीश ने अपने लिए जो ओशो सम्बोधन चुना है और जिसका अर्थ प्यारा होता है, वह भी ओषु से बना है । क्या ओष शब्द में ऐसी कोई संभावना है जिसमें प्रेम उत्पन्न हो सके ? इसका उत्तर आधुनिक भौतिक विज्ञान में चुम्बकत्व तथा अतिचालकता की घटना द्वारा दिया जा सकता है । बहुत से पदार्थों में चुम्बकत्व या आकर्षण शक्ति निर्बल होती है । सामान्य तापमान पर पदार्थ के कण इतने क्षुभित होते हैं कि वहां चुम्बकीय शक्ति संघटित नहीं हो पाती । यदि तापमान को एक सीमा से कम कर दिया जाए तो वह चुम्बकीय आकर्षण प्रबल रूप में प्रकट हो जाता है । इस घटना को समाधि के सूक्ष्म स्तर पर भी घटाने का प्रयास किया जा सकता है । समाधि को तापमान कम करने के तुल्य माना जा सकता है । बहुत सी शक्तियां जो क्षोभ के कारण व्यक्त नहीं हो पा रही थी, व्यक्त होने लगेंगी । प्रेम इनमें से एक है । यह ओषधियां कैसे उत्पन्न हों, पुराणों व वैदिक साहित्य में इसका उत्तर यज्ञ आदि का सम्पादन दिया गया है ।     अन्य बहुत से पौराणिक व वैदिक संदर्भ अभी अनुत्तरित हैं । उनमें से एक है पुराणों द्वारा ओषधियों को फलपाकान्त कहना । वैदिक साहित्य में ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं है । ऋग्वेद ७.१०.१, अथर्ववेद ३.१७.५, शतपथ ब्राह्मण ६.४.४.१७, तैत्तिरीय आरण्यक १.२९.१, तैत्तिरीय संहिता १.२.२.३, १.३.६.१, ४.१.२.४, ४.१.४.४, ६.१.३.७, ६.३.४.२, ७.५.२०.१, जैमिनीय ब्राह्मण १.७२ में ओषधियों के सुपिप्पला होने की कामना की गई है । तैत्तिरीय संहिता ६.१.३.७ का कथन है कि मन्त्रों में ओषधयः सुपिप्पला कहा जाता है, इसलिए ओषधियां फल ग्रहण करती हैं । तैत्तिरीय संहिता ६.३.४.२ का कथन है कि ओषधयः सुपिप्पला कह कर उनको यूप के ऊपरी भाग पर स्थित चक्राकार चषाल नामक भाग पर छोडा जाता है, इस कारण से ओषधियां शीर्ष में फल ग्रहण करती हैं । अश्वत्थ के फल को पिप्पल कहा जाता है । अश्वत्थ के लिए माना जाता है कि उसका मूल हिरण्यय कोश में है और शाखाएं नीचे के कोशों में । यही तथ्य ओषधियों के लिए मानने पर इसका अर्थ होगा कि ओषधियां समाधि अवस्था से प्राप्त फल को निचले कोशों में वितरित कर रहीं हैं ।

           ऋग्वेद ७.४.५, ८.४३.९, १०.१.२, १०.९१.६, अथर्ववेद ५.२५.७, शतपथ ब्राह्मण १२.४.४.४, तैत्तिरीय संहिता ४.१.४.२ व ४.२.३.३ में अग्नि को ओषधि का गर्भ कहा गया है । ऋग्वेद ५.८३.१, ७.१०१.१, ७.१०२.२, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.४.५.५, तैत्तिरीय आरण्यक १.२९.१ आदि में पर्जन्य का ओषधि के गर्भ के रूप में उल्लेख है । निहितार्थ अपेक्षित है ।

          लिङ्ग पुराण में सूर्य द्वारा ओषधियों में बल रखने का उल्लेख है । जैमिनीय ब्राह्मण १.७ के अनुसार आदित्य अस्त होकर ओषधि में ऊर्ज रूप में प्रवेश करता है । तैत्तिरीय संहिता ३.४.७.१ में ऊर्ज नामक ओषधि अप्सरा व अग्नि नामक गन्धर्व का उल्लेख है । पुराणों में साम्ब आदि कुष्ठ से पीडित होने पर सूर्य की उपासना से रोगमुक्त होते हैं । यह विचारणीय है कि रोगमुक्त होने के लिए ओषधि- पति चन्द्रमा की आराधना करनी चाहिए या सूर्य की ? ऐतरेय ब्राह्मण ३.४० के अनुसार अग्निष्टोम यज्ञ में सोम क्रय के रूप में ओषधि का क्रय करने से समस्त ओषधियों का क्रय हो जाता है और फिर पूरे अग्निष्टोम यज्ञ द्वारा भेषज कर्म किया जाता है । तैत्तिरीय संहिता में ओषधि को ऊर्ज अप्सरा कहने से तात्पर्य यह हो सकता है कि सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने पर ओषधि बहिर्मुखी अप्सरा का रूप धारण कर लेती हो ।

          ब्राह्मण ग्रन्थों में ओषधि के संदर्भ में दिशाओं का भी उल्लेख मिलता है । शतपथ ब्राह्मण ३.२.३.१९ के अनुसार ओषधि ऊर्ध्वा दिशा, जो अदिति की दिशा है, में रोहण करती है । ऐतरेय ब्राह्मण १.७ के अनुसार दक्षिण दिशा में ओषधियों का पचन पहले होता है जिसमें अग्नि कारण है । इसकी व्याख्या भौगौलिक द्रष्टान्त द्वारा की गई है । तैत्तिरीय संहिता ४.४.१२.४ में ओषधि के लिए ऊर्ध्वा दिशा को रन्ति नाम दिया गया है । तैत्तिरीय संहिता १.६.५.२ में ओषधि के लिए उदीची दिशा में मार्जन का निर्देश है । अथर्ववेद ३.२६.५, १२.३.५९ व १५.६.१ में ध्रुवा दिशा में ओषधि को इषुमती कहा गया है ।

          अथर्ववेद १२.३.३१ व तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.२.२.१ में ओषधि का पर्शु द्वारा छेदन करने का उल्लेख आता है । ओषधि छेदन के लिए जिस पर्शु का उपयोग किया जाता है , उसे तैत्तिरीय ब्राह्मण में अश्वपर्शु कहा  गया है । यह भी कहा गया है कि जो ओषधि को पर्वशः जानता है, वह ओषधि छेदन में इसकी हिंसा नहीं करता । प्रजापति ओषधि को पर्वशः जानते हैं ।

          शतपथ ब्राह्मण ७.२.४.२६, ११.६.१.१० व तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.५६ में ओषधि को पुरुष या मनुष्य का रूप दिया गया है । शतपथ ब्राह्मण ११.६.१.१० में तो प्रश्न किया गया है कि वह पुरुष कौन सा है जिसका पुरुष द्वारा भक्षण किया जाता है ? वह पुरुष ओषधि ही है ।

          अथर्ववेद १९.३२ १९.३३ सूक्त दर्भ ओषधि के लिए हैं । शतपथ ब्राह्मण ७.२.३.१, ऐतरेय आरण्यक १.२.३, तथा तैत्तिरीय आरण्यक २.११.१ में दूर्वा को मेध्य, शुद्ध आपः कहा गया है जिससे यज्ञीय आसन, वास, रज्जु आदि बनाते हैं । ऐतरेय ब्राह्मण ८.८ के अनुसार दूर्वा ओषधियों में क्षत्र है ।

          तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.५.१, तैत्तिरीय आरण्यक ३.८.१, तैत्तिरीय संहिता ६.२.४.५, ६.३.९.५, ऐतरेय ब्राह्मण २.६, ५.२८ आदि में ओषधि के रूप में बर्हि का उपयोग किया गया है । शतपथ ब्राह्मण ११.१.७.२ के अनुसार आरण्यक ओषधि बर्हि के मेध के समान है ।

          पुराणों में ओषधियों के स्वयंप्रभा वाली होने के कथन का वैदिक साहित्य में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता । तैत्तिरीय आरयक ४.१२.१ में महावीर पात्र या घर्म के संदर्भ में आपः व ओषधियों के रस को ज्योति:भा कहा गया है ।

          शतपथ ब्राह्मण ६.४.४.२ में ओषधि माताओं से अश्व की उत्पत्ति का उल्लेख है ।

          यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद व अथर्ववेद के लगभग सभी ओषधि सूक्त अनुष्टुप् छन्द में हैं ।

In common parlence, oshadhi/herb/medicine is taken as something which cures the diseases. Old aayurveda and new medicinal sciences are able to tell that this herb, this medicine will affect this part of the body. But some esoteric aspect is hidden in the oshadhi/herb of vedic literature. This is indicated by a mantra which says in contexts of the dead human body being consigned to flames for last rites that let thy eye reside in sun, thy soul in air, ---- and let thy establish yourself in herbs by bodies. The question is what bodies inside a body are being talked about? One possibility is that different parts of the body are being identified as separate bodies and the poet desires that these body parts identify themselves with particular herbs. It is no secret that a particular part of the body has itís separate needs which can be fulfilled by separate herbs. For example, it is said that whatever is the shape of the fruit, it will nourish the body part of the same shape. Thus almond, sesame etc. will nourish the eyes. The other possibility about the meaning of mantra is that the composer of the mantra of veda is talking of providing the body parts a broader view, just as eyes are being considered as sun. In this case, the crux is when a body part draws itís energy for sustenance by itself, it does not depend on supplements from outside world, it is able to attract energy from the universe. The third possibility about the meaning of mantra is that the bodies being talked about are the gross body, subtle bodies like ethereal, astral, causal body, mental body etc. about which Rajneesha has given some details about their qualities. Thus about ethereal  body, Rajneesha says that this has the quality of contracting and expanding itself. For example, it gets contracted on feeling fear due to which our feet start trembling because the ethereal body which was giving support to the gross body has withdrawn itís support. Why these bodies have been identified with herbs in the mantra, the reason for this may be that herbs develop in upper direction, opposite to gravitational force. In the same way, our subtle bodies develop opposite to gravitational force. Thus the subtle bodies can be identified with subtle hair or herbs. And these subtle bodies also work as healers for the lower body, the gross body. It can be said that the vedic seers have used the simili of herbs for explaining their own subtle facts. One mantra gives the simili of appearance of herbs by tearing of earth with tearing of our own body by fame etc.

          Vedic and puraanic literature universally identify subtle hair on our body with herbs on the earth. The earth is identified with Aditi, the mother of gods. Otherwise, Aditi means the integral unit, undivided( divided Diti is the mother of demons). In the beginning, this Aditi was without subtle hair. She became familier with upward direction due to herbs because herbs grow upwards. These herbs are her subtle hair. This situation becomes possible when this earth becomes a cow and is able to absorb sunrays at noon. Goat or sheep states, which are connected with before sunrise and after sunrise, are not desirable.

          Practically, how is it possible to develop this so called state of subtle hair? Vedic literature states different states of the formation of golden earth which starts with churning of water and ends at gold. After this, development of herbs becomes possible.

          Regarding the word meaning of oshadhi, it is evident that the word is connected with bearing of ushaa, the dawn, the lifeforce which induces the gross matter for development( all sleeping creatures, all life forces get awakened at dawn). Thus oshadhi is that gross matter which has imbibed the lifeforces which forces it to develop upwards. Then there is one statement that the setting sun placed a part of itís luster in herbs at sunset. The part which sun has put in herbs is responsible for satiating the hunger etc. The lifeforce which arouses hunger is called praana. The lifeforce which satiates it has been called Udaana. This simple statement of introduction of some luster by the setting sun in herbs could have been ignored had J.A.Gowan not stated that the charge available in gross matter fulfills the absence of symmetry in gross matter.

 

Written on 20-12-2006AD(Vikrami Pausha Krishna Amaavaasyaa, 2063)

 

ओषधि

टिप्पणी : ओषधियों का सामान्य परिचय यही है कि पशु जगत ओषधियों के भक्षण द्वारा जीवन यापन पर आधारित है । आधुनिक विज्ञान ने ओषधियों के विभिन्न अङ्गों का विश्लेषण किया है और यह सूचना दी है कि इस ओषधि के अमुक अङ्ग में यह - यह धातुएं, यह -यह प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन आदि उपलब्ध हैं । आयुर्वेद में यह तथ्य प्रतिष्ठित हो चुका है कि किस ओषधि के सेवन से शरीर के किस अङ्ग पर प्रभाव पडता है, कौन से रोग के लिए किस ओषधि का सेवन किया जाना चाहिए । यह कहा जा सकता है कि ओषधि के बारे में इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है । लेकिन वैदिक साहित्य आध्यात्मिक रूप में ओषधि को समझने के लिए कुछ संकेत प्रदान करता है  । ऋग्वेद १०.१६.३, अथर्ववेद १८.२.७, में पितृमेध के संदर्भ में कहा गया है कि हे पार्थिव शरीर, तेरा चक्षु सूर्य में जाए, आत्मा वात में विलीन हो, धर्म द्वारा तू द्युलोक व पृथिवी में जाए, आपः में यदि तेरा अंश विद्यमान है तो वहां भी जा और ओषधियों में शरीरों द्वारा प्रतिष्ठित हो । प्रश्न उठता है कि एक शरीर के अन्दर यह बहुवचन के शरीर कौन से हैं ? एक संभावना तो यह है कि शरीर के अङ्गों को बहुवचन में शरीर कहा गया है । इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि शरीर के विभिन्न अङ्गों का तादात्म्य किसी ओषधि विशेष से है । अङ्ग विशेष को जिन पोषक तत्त्वों की आवश्यकता पडती है, उनकी पूर्ति ओषधि विशेष द्वारा हो सकती है । उदाहरण के लिए, कहा जाता है कि जिस फल का जो आकार होता है, वह उसी आकार के अङ्ग की पुष्टि करता है । बादाम, तिल आदि चक्षु के आकार के होने के कारण चक्षु को पुष्ट करते हैं । अखरोट, आम्र आदि का आकार हृदय जैसा होता है । ऋग्वेद के इस मन्त्र का दूसरा अर्थ इस रूप में किया जा सकता है कि यह प्रसंग मर्त्य शरीर को विराट् रूप प्रदान करने के संदर्भ में है । यहां चक्षु की पराकाष्ठा सूर्य का उल्लेख है । इसी प्रकार शरीर के विभिन्न अङ्गों की पराकाष्ठा ओषधि विशेष के गुणों को प्राप्त होने में है जिससे उन अङ्गों की पुष्टि के लिए बाह्य ओषधियों पर आश्रित न होना पडे, वह अङ्ग स्वयं ही ओषधि का कार्य करने लगें, ब्रह्माण्ड से ऊर्जा ग्रहण करने लगें । मन्त्र के संदर्भ में तीसरी संभावना यह है कि ओषधि का विकास ऊर्ध्वा दिशा में, गुरुत्वाकर्षण की विपरीत दिशा में होता है । इसी प्रकार स्थूल, सूक्ष्म, कारण आदि शरीरों का विकास ओषधियों की भांति ऊर्ध्व दिशा में होना चाहिए, उन्हें स्थूल जगत के कर्षण से मुक्ति मिलनी चाहिए । इस संदर्भ में अन्य पौराणिक व वैदिक उल्लेख भी प्राप्त होते हैं । तैत्तिरीय आरण्यक ६.१०.२ में ओषधि द्वारा पृथिवी का विदारण कर ऊर्ध्व विकास की उपमा कीर्ति, यश, ब्रह्मवर्चस द्वारा विदारण करने से की गई है ।

           पौराणिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से उल्लेख मिलते हैं कि शरीर के लोम ओषधि - वनस्पतियों का रूप हैं ( उदाहरण के लिए, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१०.८.७) । शतपथ ब्राह्मण ३.२.३.१९ का कथन है कि इयं( यह पृथिवी ) अदिति है । इसने ऊर्ध्वा दिशा को ओषधियों के द्वारा जाना क्योंकि ओषधियां ऊर्ध्वा दिशा में उत्पन्न होती हैं । तैत्तिरीय संहिता ७.४.३.१ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.४.५ में इस अदिति को ऋक्षा नाम दिया गया है जो पूर्व में अलोमका होती है और जब इस पर ओषधि - वनस्पतियां उग आती हैं तो यह सलोमका बन जाती है । यहां यह समझने योग्य है कि वैदिक साहित्य में अदिति पर ही लोमों को उत्पन्न किया गया है, दिति पर नहीं । ऐतरेय ब्राह्मण ५.२३ में ऋग्वेद के प्रसिद्ध सार्पराज्ञी सूक्त ( १०.१८९) के संदर्भ में कहा गया है कि आरम्भ में सार्पराज्ञी अलोमका थी । इस सूक्त ( आयं गौ: पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुर: इत्यादि ) के जप से सलोमका हो गई । इस सूक्त में ऐसा क्या है जो लोम उत्पन्न कर सकता है ? इसमें एक पृश्नि गौ का उल्लेख है । गौ सूर्य की प्रखर अवस्था की किरणों को ग्रहण कर सकती है । यह उल्लेखनीय है कि यहां अज या अवि का उल्लेख नहीं है जो क्रमशः सूर्य के उदय से पूर्व की, ताप मात्र की तथा सूर्य उदय की अवस्थाएं हैं । तैत्तिरीय संहिता २.१.२.३ का कथन है कि वशा अवि के आलभन से पृथिवी का प्रथन संभव हुआ तथा उस पर ओषधियां उत्पन्न हुई । डा. फतहसिंह का कथन है कि वशा बांझ को कहते हैं, जो चन्द्रमा की भांति waxing-waning  से रहित हो। तैत्तिरीय संहिता २.१.५.३ में ओषधियों के लिए वेहत के आलभन का निर्देश है । इन सभी कथनों का आधार यही प्रतीत होता है कि किसी प्रकार से हमारे शरीर के अङ्गों में ऊर्ध्व गमन का गुण विकसित हो तो वे ओषधि का कार्य करने योग्य बन सकते हैं । रजनीश द्वारा चक्रों के संदर्भ में दी गई अपनी व्याख्या में विभिन्न चक्रों की संभावनाओं को व्यक्त किया गया है । सूक्ष्म शरीर की संभावना यह है कि वह अपने को समेट कर केन्द्रीभूत भी कर सकता है और विस्तार भी कर सकता है । रजनीश का कथन है कि कोई भय उत्पन्न होने पर पूरी देह में व्याप्त सूक्ष्म शरीर संकुचित हो जाता है जिसके कारण हमारे पैर लडखडाने लगते हैं । इसी प्रकार किसी - किसी को ध्यान में अनुभव होता है कि वह सारे कमरे में उड रहा है लेकिन आंख खोलने पर वह पाता है कि ऐसा तो कुछ भी नहीं है । रजनीश का कहना है कि यह सब सूक्ष्म शरीर की विभूतियां हैं । इससे आगे कारण शरीर, मनस् शरीर आदि में ब्रह्माण्ड में व्याप्ति की, एक चेतना से दूसरी चेतना में व्याप्ति की संभावनाएं बढती जाती हैं । अतः एक संभावना यह है कि इन सूक्ष्म, कारण आदि शरीरों का विकसित होना ही हमारी स्थूल देह के लिए ओषधि का कार्य करता है । यह विकास कैसे हो, इस संदर्भ में वैदिक साहित्य में तो विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख आता है । तैत्तिरीय संहिता ५.५.४.१ का कथन है कि असौ( आदित्य ) द्वारा पृथिवी पर रेतः के सिञ्चन से वह रेतः ओषधियों - वीरुधों के रूप में उत्पन्न होता है । तैत्तिरीय संहिता २.५.३.२ में अमावास्या के संदर्भ में कहा गया है कि वृत्र के हनन के लिए उद्यमशील इन्द्र के वीर्य के बिखरने से ओषधियों का जन्म हुआ । शतपथ ब्राह्मण ६.१.१.१३ में प्रजापति द्वारा श्रान्त होने पर क्रमशः मृदा, शुष्क आपः, ऊष, सिकता, अयः, हिरण्य और ओषधि - वनस्पतियों को उत्पन्न करने का उल्लेख है । शतपथ ब्राह्मण में ही अन्यत्र उल्लेख आता है कि पहले आपः का मन्थन करने पर उसमें फेन उत्पन्न हुआ, फिर फेन से मृदा, मृदा से सिकता, सिकता से अयः, अयः से हिरण्य आदि । यह एक पहेली है कि हिरण्य से ओषधियां कैसे उत्पन्न होंगी ।

          ओषधि शब्द की निरुक्ति के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि ओषं धीयते इति ओषधि । लेकिन प्रश्न यह उठता है कि यह ओष क्या होता है । ओष का सम्बन्ध उषा से, सुप्त जगत में प्राणों का सर्वप्रथम संचार करने वाली उषा से भी हो सकता है । अथर्ववेद १९.२९.७ का कथन है कि ओष दर्भ सपत्नान् मे, अर्थात् हे दर्भ नामक ओषधि, तू मेरे शत्रुओं का ओषन कर । यहां ओष का अर्थ उषा का समावेश करने से लिया जा सकता है । अतः ओषधि में यह गुण है कि ओषधि अवस्था में द्रव्य ओषन करने में समर्थ होता है । इसी कारण वह ऊपर की ओर वर्धन कर सकता है, अन्यथा जड पदार्थ में तो कोई विकास संभव नहीं है । और जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, ओषधि का विकास हिरण्य अवस्था या अदिति अवस्था से आगे ही संभव है । ओष को धारण करने वाली ओषधि की यह स्थिति अग्नि को गर्भ में धारण करने वाली ओषधि की हो सकती है । फिर जैमिनीय ब्राह्मण १.७ में उल्लेख किया गया है कि अस्त होते हुए सूर्य ने अपनी ऊर्क् ओषधि में रख दी । ऊर्क् को समझने के लिए ऊर्ज शब्द पर टिप्पणी पठनीय है । आश्विन् व कार्तिक मासों को इष व ऊर्ज मास कहा जाता है । शतपथ ब्राह्मण १.२.२.६, ४.२.२.१५, १४.२.२.२७, जैमिनीय ब्राह्मण १.८० व १.८८ के अनुसार इष वर्षा है और ऊर्ज वह है जिसका वर्षा के फलस्वरूप वर्धन होता है । शतपथ ब्राह्मण ४.२.२.१५ के अनुसार इष भक्ति की आरम्भिक अवस्था हिंकार है । इसका निहितार्थ यह होगा कि हिंकार से आगे की अवस्थाएं प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन ऊर्ज के अन्तर्गत आती हैं । इष का सम्बन्ध प्राण से है और ऊर्ज का उदान से । प्राणों द्वारा वर्षा की, दिव्य वर्षा की अभीप्सा की जाती है । प्राणों के लिए वर्षा रूपी अन्न पर्याप्त है लेकिन उदान के लिए ऊर्ज की आवश्यकता पडती है । तैत्तिरीय ब्राह्मण १.२.१.३ में क्षुधा की तृप्ति के लिए इष-ऊर्ज की कामना की गई है । फिर ऊर्क् को वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से उदुम्बर से सम्बद्ध किया गया है । उदुम्बर की निरुक्ति में कहा गया है कि जो सब पापों से मुक्ति दिला दे, वह उदुम्बर है ।

           एक विचित्र तथ्य यह है कि वैदिक साहित्य में आपः और ओषधियों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध दिखाया गया है । तैत्तिरीय संहिता ३.३.६.२  में दर्भ के संदर्भ में प्रश्न उठाया गया है कि ओषधियां आपः से क्यों उत्पन्न होती हैं । तैत्तिरीय संहिता २.१.९.२ का कथन है कि अन्न प्राप्ति के लिए आपः व ओषधियों की सन्धि आवश्यक है । ओषधियां मैत्र हैं जबकि आपः वारुण है । अन्यत्र कहा गया है कि न तो केवल ओषधियों के भक्षण से तृप्ति हो सकती है और न ही केवल आपः के पान से । आपः द्वारा ओषधियों में रस का सृजन होता है । तैत्तिरीय संहिता ७.२.३.१ का कथन है कि दर्भ की विशेषता यह है कि यह आपः और ओषधि दोनों है । शतपथ ब्राह्मण १२.८.१.४ में सुरा को आपः व ओषधियों का रस कहा गया है । शतपथ ब्राह्मण १.२.२.२ का कथन है कि आपः रेवत्य हैं जबकि ओषधियां जगत्य हैं । यह कथन मन्त्र ''सं रेवतीर्जगतीभिर्मधुमतीर्मधुमती- - - - इत्यादि( तैत्तिरीय संहिता १.१.८.२) की व्याख्या के अन्तर्गत किया गया है । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.२.८.२ का कथन है कि आपः रेवत्य हैं, पशु जगती हैं और ओषधियां मधुमती हैं । यह अन्वेषणीय है कि आपः क्या हैं । क्या वे प्राण हैं ? मन्त्र आपः अस्मान् मातर: शुन्धयन्तु के आधार पर यह कहा जा सकता है आपः का मुख्य कार्य पापों का शोधन करना है ।  इसीलिए वह वारुण्य हैं ।

           ऋग्वेद १०.९७.६ की ऋचा है - यत्रौषधी: समग्मत राजानः समिताविव । विप्र: स उच्यते भिषक् । इसी मन्त्र की पुनरुक्ति तैत्तिरीय संहिता ४.२.६.१ में की गई है । डा. फतहसिंह के अनुसार समिति वह होती है जहां सब सदस्य एक मति रखते हैं । मन्त्र संकेत करता है कि ओषधियों के उत्पन्न हो जाने के पश्चात् भी यह आवश्यक है कि इन ओषधियों में सामञ्जस्य हो, समिति का निर्माण हो । तभी विप्र भेषज कर्म कर सकता है ।

          अथर्ववेद ३.२३.६ में ओषधि के पिता के रूप में द्युलोक, माता के रूप में पृथिवी तथा मूल के रूप में समुद्र का उल्लेख है । अथर्ववेद १९.३२.३ में ओषधि के दिवि में तूल तथा पृथिवी में निष्ठित होने का उल्लेख है । अथर्ववेद ८.७.४ में आपः के अग्र होने तथा ओषधियों के दिव्य होने का उल्लेख है । यह संकेत करता है कि आपः अग्र उन्हीं ओषधियों में बन सकता है जो दिव्य हों । गवामयन याग के संदर्भ में जैमिनीय ब्राह्मण २. तथा तैत्तिरीय संहिता ७.५.१.६ का कथन है कि ओषधियों का अग्र/फल ऐसे है जैसे गवामयन सत्र में एक मास में पहले २४ दिन ४ अभिप्लव षडहों का सम्पादन किया जाता है और फिर शेष ६ दिन में पृष्ठ्य षडह का । फल पृष्ठ्यषडह का रूप है। ऐसा कहा जाता है कि अभिप्लव षडह देवों द्वारा त्वरित गति से प्रगति करने का मार्ग है जबकि पृष्ठ्य षडह मर्त्य प्राणों द्वारा मन्द गति से प्रगति करने का । इसको ऐसा भी समझा जा सकता है कि यह मर्त्य स्तर पर प्राप्त अमृत स्तर की विभूति है । तैत्तिरीय संहिता ७.५.१८.१ में ओषधियों को फलिनी कहा गया है और यहां योगक्षेम का भी उल्लेख है । यह संकेत करता है कि ओषधियों के फल के रूप में ही योगक्षेम का उल्लेख है । तैत्तिरीय संहिता ६.३.९.५ का कथन है कि पशुओं में वपा अग्र होती है, वैसे ही जैसे ओषधियों में बर्हि अग्र होती है । अग्र के संदर्भ में आग्रयण ग्रह का विवरण भी विचारणीय है । तैत्तिरीय ब्राह्मण १.६.१.९ (तथा २.१.१.१) का कथन है कि आग्रयण द्वारा नवीन अन्न को देवों व पितरों को अर्पित किया जाता है । यदि अहुत का भक्षण किया जाता है तो प्रजा प्रजापति से दूर चली जाती है । यदि हुत अन्न का भक्षण किया जाता है तो वह पास आ जाती है । तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.१.१ का कथन है कि अङ्गिरसों ने कठिनाई से वृष्टि द्वारा ओषधियों को उत्पन्न किया। पितरों ने विष से उसका लिम्पन कर दिया । तब पितरों को भाग देने से ओषधियां स्वादिष्ट बनी । ओषधियों व वनस्पतियों के फलों के रूप में पिप्पल का मन्त्रों में सार्वत्रिक रूप से उल्लेख आता है ।

          वैदिक मन्त्रों में ओषधियों द्वारा अग्नि व सोम दोनों को गर्भ में धारण करने के उल्लेख आते हैं । ऋग्वेद १०.९१.६, शतपथ ब्राह्मण १२.४.४.४ (अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनुरुध्यसे) में ओषधियों द्वारा अग्नि को गर्भ में रखने और आपः द्वारा उसका जनन करने का उल्लेख है । तैत्तिरीय संहिता ५.१.५.४ में ओषधियों को अग्नि की माताएं कहा गया है । ऋग्वेद ३.१.१३ का कथन है कि आपः में अग्नि गर्भ रूप में है जबकि ओषधियों में दृश्य रूप में । तैत्तिरीय संहिता ३.४.७.१ (तथा शतपथ ब्राह्मण ९.४.१.७) का कथन है कि अग्नि गन्धर्व है जबकि ओषधियां ऊर्ज (मुद) नामक अप्सराएं । तैत्तिरीय संहिता ३.५.५.२ का कथन है कि पशु आदित्य रूप हैं, अग्नि रुद्र रूप है । यदि पशुओं को अग्नि में प्रतिष्ठित किया जाएगा तो अग्नि उनको हानि पहुंचाएगी । अतः उन्हें ओषधियों में प्रतिष्ठापित किया जाता है ।

          ओषधियों में सोम का आविर्भाव गर्भ रूप में तब होता है जब पर्जन्य आदि द्वारा रस का वर्षण होता है ( तैत्तिरीय ब्राह्मण २.४.५.५, तैत्तिरीय आरण्यक ६.६.४ ) । अथर्ववेद ७.४०.१ में ओषधियों में रस का सिंचन करने वाले को दिव्य सुपर्ण और वृषभ कहा गया है । शतपथ ब्राह्मण १२.१.१. में उद्गाता ऋत्विज को पर्जन्य का रूप कहा गया है । ओषधियों से इस सोम की प्राप्ति ओषधियों के पेषण से होती है ( ऋग्वेद १०.८५.३, अथर्ववेद १४.१.३) । यह उल्लेखनीय है कि सोमयाग में वीरुध आदि का ग्रावा/अद्रि आदि से पेषण किया जाता है और उस पिष्ट ओषधि को जल में मिलाकर उस जल की सोम रूप में कल्पना की जाती है । ओषधि के ऋजीष/तृण भाग को अन्त में फेंक दिया जाता है या जल में प्रवाहित कर दिया जाता है । अथर्ववेद ९.४.५ का कथन है कि शरीर बृहद् अद्रि है और शक्र सोम का भक्षण करने वाला है ।

 

          अथर्ववेद १९.४.७ में पूर्वा व नवा ओषधियों का उल्लेख आया है । यह पूर्वा और नवा कौन सी हैं, यह स्पष्ट नहीं है । शतपथ ब्राह्मण ७.२.४.२६ का कथन है कि जो ओषधियां वसन्त, प्रावृट् व शरद ऋतुओं में उत्पन्न होती हैं, वह पूर्वा हैं । ऋग्वेद १०.९७.१ में भी पूर्व में उत्पन्न ओषधियों का उल्लेख है ।

          जैमिनीय ब्राह्मण १.७ में अग्निहोत्र के संदर्भ में अस्त होते हुए सूर्य द्वारा सायंकाल ओषधियों में ऊर्क् स्थापित करने का उल्लेख है । कहा गया है कि अग्निहोत्र में जो तृण को जलाकर अवज्योतन किया जाता है, यह वही ऊर्क् का रूप है । शतपथ ब्राह्मण ११.६.६.१० में भी यही प्रसंग कुछ अन्तर  के साथ आया है । सामान्य स्थिति में तो ऐसे कथन की उपेक्षा कर दी जाती है । लेकिन श्री गोवान के इस कथन से कि जड पदार्थ के सूक्ष्म कणों पर जो आवेश विद्यमान है, वह जड पदार्थ में सममिति के अभाव को पूरा कर रहा है ( क्योंकि वैद्युत आवेश सममित होता है ), इस कथन का महत्त्व उजागर होता है । सूर्य की स्थिति को सममिति की स्थिति तथा जड पृथिवी को असममिति की स्थिति कहा जा सकता है । अतः यदि सूर्य अपने अंश का पृथिवी में समावेश करता है, तो उसको उपरोक्त संदर्भ में सोचा जाना चाहिए । ऐतरेय ब्राह्मण ५.२८ व तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.५.१ का कथन है कि अग्निहोत्र में जो कार्य ओषधि द्वारा सम्पन्न किया जाता है, सोमयाग में वही कार्य बर्हि द्वारा किया जाता है । सोमयाग में आहवनीय अग्नि के समीप प्रस्तर तथा अन्य स्थानों पर बर्हि को बिछाया जाता है । तैत्तिरीय आरण्यक ३.८.१ का कथन है कि वेदी अदिति का रूप है और बर्हि ओषधि का रूप है । इस प्रकार अदिति रूपी पृथिवी का ओषधि रूपी बर्हि से आच्छादन करके उसे सलोम बनाया जाता है । शतपथ ब्राह्मण १.५.३.१२ का कथन है कि जो ओषधियां वर्षवृद्ध हो जाती हैं, हेमन्त को सहन कर जाती हैं, वह वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा के पश्चात् शरद ऋतु में पूरा विस्तार प्राप्त कर लेती हैं । उन्हें ही बर्हि ( बृह धातु से ) कहा जाता है । शतपथ ब्राह्मण ११.१.७.२ से संकेत मिलता है कि बर्हि का सम्बन्ध आरण्यक ओषधियों से हो सकता है जो अकृष्टपच्या होती हैं । तैत्तिरीय संहिता ६.३.९.५ का कथन है कि पशुओं में वपा अग्र होती है, वैसे ही जैसे ओषधियों में बर्हि अग्र होती है ।

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