पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Jalodbhava  to Tundikera)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Jalodbhava - Jaatipushpa (Jahnu, Jagrata / awake, Jaajali, Jaataveda / fire, Jaati / cast etc.)

Jaatukarnya - Jaala  (Jaatukarnya, Jaanaki, Jaabaali, Jaambavati, Jaambavaan etc. )  

Jaala - Jeeva  (Jaala / net, Jaalandhara, Jaahnavi, Jihvaa / tongue, Jeemuuta, Jeeva etc.)

Jeeva - Jaimini ( Jeevana / life, Jrimbha, Jaigeeshavya, Jaimini etc.) 

Joshtri - Jyeshthaa (Jnaana / knowledge, Jyaamagha, Jyeshthaa etc. )  

Jyeshthaa - Jwalanaa  ( Jyeshthaa, Jyoti / light, Jyotisha / astrology, Jyotishmaan, Jyotsnaa, Jwara / fever etc. )

Jwalanaa - Dhaundhaa (Jwaala / fire, Tittibha, Damaru, Daakini, Dimbhaka, Dhundhi etc.)

Ta - Tatpurusha ( Taksha / carpenter, Takshaka, Takshashilaa, Tattva / fact / element etc. ) 

Tatpurusha - Tapa (Tatpurusha, Tanu / body, Tantra / system, Tanmaatraa, Tapa / penance etc. )

Tapa - Tamasaa (Tapa, Tapati, Tama / dark, Tamasaa etc.)

Tamaala - Taamasi (Tarpana / oblation, Tala / level, Taatakaa, Taapasa, Taamasa etc.)

Taamisra - Taaraka (Taamisra, Taamboola / betel, Taamra / copper, Taamraparni, Taamraa, Taaraka etc.)

Taaraka - Taala (Taaraa, Taarkshya, Taala etc.)

Taala - Tithi  (Taalaketu, Taalajangha, Titikshaa, Tithi / date etc. )

Tithi - Tilottamaa  (Tila / sesame, Tilaka, Tilottamaa etc.)

Tilottamaa - Tundikera (Tishya, Teertha / holy place, Tungabhadra etc.)

 

 

General meaning of  Sanskrit word Tapa is taken as heating. And vedic texts have used the same meaning for higher purposes. Wherever there is unripe stage, whether it is of a fruit or of consciousness or mind, it has to be ripened by tapah. Tapa can not be explained properly until one takes into consideration the modern concept of entropy, i.e., to decrease the disorder in a system for getting useful work out of it. Tapah has been classified into several stages, viz., at the stages of fire, air, sun, moon etc. Every stage imparts some specific qualities.  While searching a useful meaning of tapah, it can be said that whatever is producing heat inside us, like hate, anger, sex etc., all that has to be ordered by tapah. The purest form of tapah is when it takes us to a state which is free from rigidity, impurity of gross matter and it is  called swah. One has to start from tapah and be able to impart / donate swah.

 

तप

टिप्पणी :- तैत्तिरीय संहिता १.६.१२.२, ऋग्वेद ८.८९.७ आदि में निम्नलिखित ऋचा प्रकट हुई है

आ॒मासु॑ प॒क्वमैर॑य॒ आ सूर्यं॑ रोहयो दि॒वि। घ॒र्मं न साम॑न् तपता सुवृ॒क्तिभि॒र्जुष्टं॒ गिर्व॑णसे गिरः(बृ॒हत्-पाठ भेद)।।

इस ऋचा में इन्द्र से प्रार्थना की जा रही है कि जो कच्चा(आम) है, उसके पकने की प्रेरणा दो, सूर्य का द्युलोक में आरोहण करो। जैसे घर्म का साम द्वारा तापन किया जाता है, ऐसे। आम के पक्व में रूपान्तरण में तप के योगदान के संदर्भ में यह एकमात्र संदर्भ नहीं है। ऋग्वेद १०.१६.४ तथा अथर्ववेद १८.२.८ के अनुसार-

अ॒जो भा॒गस्तप॑स॒स्तं त॑पस्व॒ तं ते॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं ते॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु लो॒कम्।।

इस मन्त्र में अग्नि से प्रार्थना की जा रही है कि मृतक का जो अज भाग है, उसका तप से तापन करो। छान्दोग्य उपनिषद में सूर्य के उदय के संदर्भ में अज, अवि, गौ, अश्व व पुरुष भक्तियों का उल्लेख आया है। सूर्योदय से पूर्व की अवस्था अज है, सूर्योदय के समय की अवि, मध्याह्न की गौ, अपराह्न की अश्व और अस्त की पुरुष। यह कहा जा सकता है कि अज भक्ति को पकाकर अन्य प्रकार की भक्तियों में रूपान्तरित करना है। आजकल की भाषा में यह पकाना अचेतन या अर्धचेतन मन का चेतन मन में रूपान्तरण हो सकता है। तैत्तिरीय आरण्यक २.९.१ में अजा पृश्नियों द्वारा तप से ऋषि बनने और फिर ऋषि बनकर ऋग्वेद के रूप में पयः आहुतियों की प्राप्ति करने, यजुर्वेद के रूप में घृताहुतियों की, सामवेद के रूप में सोमाहुतियों की और अथर्ववेद के रूप में मधु आहुतियों की प्राप्ति करने का उल्लेख है।

तप और सलिल --    

तप के संदर्भ में ऋग्वेद १०.१२९.३ के नासदीय सूक्त में सलिल का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है

तम॑ आसी॒त् तम॑सा गू॒ळ्हमग्रे॑ ऽप्रके॒तं स॑लि॒लं सर्व॑मा इ॒दम्। तु॒च्छ्येना॒भ्वपि॑हितं॒ यदासी॒त् तप॑स॒स्तन्म॑हि॒नाजा॑य॒तैक॑म्।।

     शतपथ ब्राह्मण ११.१.६.१ में इसका स्वरूप इस प्रकार है कि पहले यह आपः सलिल ही था। आपः ने कामना की कि वह प्रजा उत्पन्न करे। उन्होंने तप किया जिससे एक हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। संवत्सर बीतने के पश्चात् उससे प्रजापति उत्पन्न हुए-

आपो ह वा इदम् अग्रे सलिलमेवास। ता अकामयंत। कथं नु प्रजायेमहीति। ता अश्राम्यन्। तास्तपोऽतप्यंत। तासु तपस्तप्यमानासु हिरण्मयमांडं संबभूव। अजातो ह तर्हि संवत्सर आस। तदिदं हिरण्मयमांडं यावत्संवत्सरस्य वेला तावत्पर्यप्लवत। ततः संवत्सरे पुरुष समभवत्, स प्रजापतिः। तस्मादु संवत्सर एव स्त्री वा गौर्वा वडवा वा विजायते। - श. ११.१.६.१

शतपथ ब्राह्मण में ही अन्यत्र आता है कि आपः द्वारा तप करने से पहले सलिल से फेन उत्पन्न हुआ, फेन से मृदा, मृदा से सिकता, सिकता से शर्करा, शर्करा से अयः, अयः से हिरण्य।

तप और स्वः

ऋग्वेद १०.१५४.२ के प्रेतोपस्थान सूक्त के अनुसार

तप॑सा॒ ये अ॑नाधृ॒ष्यास्तप॑सा॒ ये स्व॑र्य॒युः। तपो॒ ये च॑क्रि॒रे मह॒स्ताँश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात्।।

इस ऋचा में कहा जा रहा है कि हे प्रेत, जो पितर तप से अनाधृष्य, आक्रमण से सुरक्षित बन गए हैं, जो तप से स्वः को प्राप्त हो गए हैं, वहां भी तू जा। ऋग्वेद १०.१६७.१ के अनुसार

तुभ्ये॒दमि॑न्द्र॒ परि॑ षिच्यते॒ मधु॒ त्वं सु॒तस्य॑ क॒लश॑स्य राजसि। त्वं र॒यिं पु॑रु॒वीरा॑मु नस्कृधि॒ त्वं तपः॑ परि॒तप्या॑जयः॒ स्वः॑।।

इस ऋचा के अन्तिम पाद में कहा गया है कि इन्द्र ने तप का परितपन करके स्वः पर विजय प्राप्त की। जैसा कि अन्यत्र टिप्पणियों में कहा जा चुका है, कण्ठ के विशुद्धि चक्र में स्वरों की स्थिति कही जाती है। स्वर व्यञ्जनों जैसी स्थूलता से रहित होते हैं।

     तैत्तिरीय आरण्यक २.१४.१ में विभिन्न परिस्थितियों में स्वाध्याय का साम्य तप से स्थापित किया गया है

तस्य॒ वा ए॒तस्य॑ य॒ज्ञस्य॒ मेघो॑ हवि॒र्धानं॑ वि॒द्युद॒ग्निर्व॒र्षँ ह॒विस्त॑नयि॒त्नुर्व॑षट्का॒रो यद॑व॒स्फूर्ज॑ति॒ सोऽनु॑वषट्का॒रो वा॒युरा॒त्माऽमा॑वा॒स्या॑ स्विष्ट॒कृत्। य ए॒वं वि॒द्वान्मे॒घे व॒र्षति॑ वि॒द्योत॑माने स्त॒नत्य॑व॒स्फूर्ज॑ति पव॑माने वा॒याव॑मावा॒स्यायाँ स्वाध्या॒यमधी॑ते॒ तप॑ ए॒व तत्त॑प्यते॒ तपो॑ हि स्वाध्या॒य इति।

तप व घर्म

याभिः॑ शुच॒न्तिं ध॑न॒सां सु॑षं॒सदं॑ त॒प्तं घ॒र्ममो॒म्याव॑न्त॒मत्र॑ये। याभिः॒ पृश्नि॑गुं पुरु॒कुत्स॒माव॑तं ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्।। - ऋ. १.११२.७

यु॒वमत्र॒येऽव॑नीताय त॒प्तमूर्ज॑मो॒मान॑मश्विनावधत्तम्। यु॒वं कण्वा॒यापि॑रिप्ताय॒ चक्षुः॒ प्रत्य॑धत्तं सुष्टु॒तिं जु॑जुषा॒णा।। - ऋ. १.११८.७

चतुः॑सहस्रं॒ गव्य॑स्य प॒श्वः प्रत्य॑ग्रभीष्म रु॒शमे॑ष्वग्ने। घ॒र्मश्चि॑त् त॒प्तः प्र॒वृजे॒ य आसी॑दय॒स्मय॒स्तम्वादा॑म॒ विप्राः॑।। - ऋ. ५.३०.१५

*दे॒वहि॑तिं जुगुपुर्द्वाद॒शस्य॑ ऋ॒तुं नरो॒ न प्र मि॑नन्त्ये॒ते। सं॒व॒त्स॒रे प्रा॒वृष्याग॑तायां त॒प्ता घ॒र्मा अ॑श्नुवते विस॒र्गम्।।(दे. मण्डूकाः) - ऋ. ७.१०३.९

यह समझना होगा कि घर्म किसे कहते हैं। घर्म को लौकिक भाषा में गर्म कहा जा सकता है। एक संदर्भ में कहा गया है कि शिश्न ही घर्म है। ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे व्यक्तित्व में जहां भी कोई गर्मी उत्पन्न हो चाहे काम से, क्रोध से आदि, वह सब घर्म का रूप है। इस घर्म का शोधन करके, तप करके इसे सूर्य का रूप देना है, आकाश में स्थापित करना है।

तप व वृष

पुराणों में तो शिव के वृष को तप का रूप कह दिया गया है। वैदिक साहित्य में तो केवल निम्नलिखित ऋचा में ही वृष का तप के साथ उल्लेख आया है-

यो नः॒ सनु॑त्यो अभि॒दास॑दग्ने॒ यो अन्त॑रो मित्रमहो वनु॒ष्यात्। तम॒जरे॑भि॒र्वृष॑भि॒स्तव॒ स्वैस्तपा॑ तपिष्ठ॒ तप॑सा॒ तप॑स्वान्।। - ऋ. ६.५.४

प्रतीत होता है कि इस ऋचा में अग्नि के वृषों को स्वः(बहुवचन) के समकक्ष रखा गया है।

तप के विभिन्न स्तर --

अथर्ववेद १९.४३ सूक्त निम्नलिखित है

यत्र॑ ब्रह्म॒विदो यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह। अ॒ग्निर्मा॒ तत्र॑ नयत्व॒ग्निर्मे॒धा द॑धातु मे। अ॒ग्नये॒ स्वाहा॑।। यत्र॑ ० ० । वा॒युर्मा॒ तत्र॑ नयतु वा॒युः प्रा॒णान् द॑धातु मे। वा॒यवे॒ स्वाहा॑।। यत्र॑ ० ० । सूर्यो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु॒ चक्षुः॒ सूर्यो॑ दधातु मे। सूर्या॑य॒ स्वाहा॑। यत्र॑ ० ० । च॒न्द्रो मा॒ तत्र॑ नयतु॒ मन॑श्च॒न्द्रो द॑धातु मे। च॒न्द्राय॒ स्वाहा॑।। यत्र॑ ० ० । सोमो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु॒ पयः॒ सोमो॑ दधातु मे। सोमा॑य॒ स्वाहा॑।। यत्र॑ ० ० । इन्द्रो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु॒ बल॒मिन्द्रो॑ दधातु मे। इन्द्रा॑य॒ स्वाहा॑।। यत्र॑ ० ०। आपो॑ मा॒ तत्र॑ नयन्त्व॒मृतं॒ मोप॑ तिष्ठतु। अ॒द्भ्यः स्वाहा॑।। यत्र॑ ० ० । ब्र॒ह्मा मा॒ तत्र॑ नयतु ब्र॒ह्मा ब्रह्म॑ दधातु मे। ब्र॒ह्मणे॒ स्वाहा॑।। अ. १९.४३.१-८

     इस सूक्त में अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, सोम, इन्द्र, आपः और ब्रह्मा के स्तर पर तप और दीक्षा का उल्लेख है। प्रत्येक स्तर पर क्या प्राप्त होना है, इसका भी उल्लेख है। अग्नि के स्तर पर मेधा की प्राप्ति होनी है, वायु के स्तर पर प्राणों की, सूर्य के स्तर पर चक्षु की, चन्द्रमा के स्तर पर मन की, सोम के स्तर पर पयः की, इन्द्र के स्तर पर बल की, आपः के स्तर पर अमृत की और ब्रह्मा के स्तर पर ब्रह्म की। मेधा, प्राण आदि शब्दों को समझना अभी एक पहेली ही बनी हुई है। एक संभावना यह है कि मेधा, प्राण, चक्षु, मन, पयः, अमृत, बल, ब्रह्म प्रत्येक में अचेतन या अर्धचेतन भाग विद्यमान है जिसको तप द्वारा शुद्ध करना है। अग्नि के स्तर पर मेधा की प्राप्ति का उल्लेख अथर्ववेद ७.६३.१-२ में भी है। मेधा शब्द को पुराणों में मेधा के उल्लेखों से समझा जा सकता है। मेधा को मङ्गल पत्नी, घण्टानाद व व्रणदाता माता कहा गया है। व्रणदाता से संकेत मिलता है कि मेधा से रक्तपात जैसी स्थिति, युद्ध की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। वैदिक साहित्य में अश्वमेध, पुरुषमेध व पितृमेध प्रसिद्ध हैं। पितृमेध में मृतक शरीर को अग्नि में जलाया जाता है। अन्यत्र मेधा को श्रुत व स्मृति की माता कहा गया है। स्मृति से अर्थ जातिज्ञान हो सकता है। मेधा को समझने का एक प्रयास दुर्गा सप्तशती के आधार पर किया जा सकता है जहां सुरथ राजा और समाधि वैश्य अपना राज्य और धन खोकर अन्ततः मेधा/सुमेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचते हैं और मेधा ऋषि उन्हें प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्रों के रूप में तीन आख्यान सुनाते हैं (समाधि वैश्य को इस प्रकार समझा जा सकता है कि आत्मा १६वीं कला है और १५ कलाएं उसका वित्त/धन हैं)। १६वीं कला को क्षय-वृद्धि से रहित कहा जाता है। प्रथम चरित्र में वर्णन आता है कि जब विष्णु एकार्णव में शेष पर सोए हुए थे तो उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ जिससे ब्रह्मा प्रकट हुए। इसी बीच विष्णु के कर्णमल से मधु व कैटभ की उत्पत्ति हुई जिनके हनन के लिए ब्रह्मा की स्तुति पर विष्णु के शीर्ष, मुख, नासिका, हृदय और वक्ष से योगमाया बाहर निकल कर प्रकट हो गई और विष्णु जाग गए। विष्णु ने अन्ततः मधु असुर का सिर चक्र से काट दिया। मधु असुर क्या हो सकता है, इसके बारे में बृहदारण्यक उपनिषद में दी गई मधु विद्या के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है। कहा गया है कि यह पृथिवी सब भूतों के लिए मधु है और सब भूत इस पृथिवी के लिए मधु हैं। यहां पृथिवी का तात्पर्य हमारी चेतना लिया जा सकता है। जब सभी भूत हमारी चेतना को आनन्द देने वाले बन जाएं और हमारी चेतना सभी भूतों के लिए आनन्दप्रद हो, वह मधु विद्या है। जब ऐसी स्थिति न हो, अपितु कुछेक भूत ही, विषय ही हमारी चेतना के लिए आनन्दप्रद हों, वह मधु असुर की स्थिति होगी। विष्णु को यज्ञ कहा गया है। जैसे ही यह ज्ञान होता है कि किसी कार्य का शुद्ध स्वरूप, यज्ञ स्वरूप क्या है, यह विष्णु का जाग जाना है। मधु असुर के वध पर मधु असुर का मेद इस पृथिवी पर फैल जाता है जिससे इस पृथिवी का नाम मेदिनी हो जाता है। वास्तव में मेदिनी को मेधिनी कहा जा सकता है। यह प्रथम चरित्र ऋग्वेद से सम्बन्धित कहा गया है। इस प्रकार मेधा ऋषि द्वारा मधु-कैटभ असुरों के वध का वृत्तान्त सुनाना तर्कसंगत है। इसके पश्चात् मध्यम चरित्र में देवगण अपने अपने तेज से एक देवी का निर्माण करते हैं जो महिषासुर का नाश करती है। यह यजुर्वेद से सम्बन्धित है। उत्तम चरित्र में देवी के पुराने कोश से एक नई देवी प्रकट होती है जो शुम्भ-निशुम्भ का वध करती है। यह सामवेद से सम्बन्धित है।

     वायु के स्तर पर तप से प्राणों की प्राप्ति कही गई है। वायु अन्तरिक्ष की पूर्ति करती है। अन्तरिक्ष में वयः रूपी प्राण उडते फिरते हैं। सारा अन्तरिक्ष प्राणों से भरा पडा है लेकिन हम उन प्राणों का स्पर्श नहीं कर पाते। यदि हम उनके स्पर्श का अनुभव होने लगे तो संभवतः स्थूल भोजन की आवश्यकता नहीं पडेगी।

     सूर्य के स्तर पर चक्षु की प्राप्ति कही गई है। अन्यत्र सूर्य की स्थिति गर्भ जैसी कही गई है। गर्भ माता के शरीर से जो कुछ चाहे ग्रहण कर सकता है, लेकिन देता कुछ नहीं। सूर्य का चक्षु ऐसा है जिसके द्वारा देखने के लिए बाहर के प्रकाश की आवश्यकता नहीं पडती, स्वयं वह चक्षु ही प्रकाश भी देता है। चक्षु के संदर्भ में दूसरी संभावना को निम्नलिखित दोहे के आधार पर व्यक्त किया जा सकता है चरणदास गुरु किरपा कीन्ही उलट दीन्हि मोरि नैन पुतरिया।

शतपथ ब्राह्मण १४.८.११.१/बृहदारण्यक उपनिषद ५.११.१ में मृत्यु-पश्चात् प्रेत संस्कार के विषय में कहा गया है

एतद्वै परमं तपः। यद् व्याहितस्तप्यते। परमं हैव लोकं  जयति। य एवं वेद। एतद्वै परमं तपः। यं प्रेतमरण्यं हरन्ति। परमं हैव लोकं जयति। य एवं वेद। एतद्वै परमं तपः। यं प्रेतमग्नावभ्यादधति। परमं हैव लोकं जयति। य एवं वेद। - श. १४.८.११.१

इस कथन के भाष्य में कहा गया है कि मृत्यु काल में ज्वर से  ग्रस्त होना पहला परम तप है, फिर मृतक को जो अरण्य में ले जाते हैं वह दूसरा परम तप है और फिर मृतक का दाह संस्कार करते हैं, वह तीसरा परम तप है। इस कथन में व्याहित का भाष्य व्याधित, ज्वर आदि व्याधि से ग्रस्त किया गया है। ज्वर के पश्चात् ही मृत्यु होती है। लेकिन यहां व्याहित का अर्थ वि-आहित भी लिया जा सकता है। आहिताग्नि उस पुरुष को कहते हैं जो जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र आदि कृत्यों के हेतु अग्नि को धारण करता है। उस व्यक्ति के मृत्यु पर्यन्त तथा मृत्यु पश्चात् भी सभी कर्म आहिताग्नि से ही सम्पन्न होते हैं। महाभारत आश्रमवासिक पर्व ३७ में युधिष्ठिर शोक करते हैं कि धृतराष्ट्र आदि अरण्य में वृथा अग्नि में जल कर मर गए। लेकिन नारद उन्हें संतोष दिलाते हैं कि वे वृथाग्नि में नहीं जले, अपितु तीन भागों में विभाजित(आहवनीय, अन्वाहार्यपचन व गार्हपत्य) यज्ञाग्नि में जले हैं। वृथाग्नि उस अग्नि को कहते हैं जिसे अर्जुन ने खाण्डव वन में तृप्त किया था। अथर्ववेद शौनक संहिता १८.४.९ में कहा गया है

पूर्वो॑ अ॒ग्निष्ट्वा॑ तपतु॒ शं पु॒रस्ता॒च्छं प॒श्चात् त॑पतु॒ गार्ह॑पत्यः। द॒क्षि॒णा॒ग्निष्टे॑ तपतु॒ शर्म॒ वर्मो॑त्तर॒तो म॑ध्य॒तो अ॒न्तरि॑क्षाद् दि॒शोदि॑शो अग्ने॒ परि॑ पाहि घो॒रात्।।

पूर्व आदि दिशाओं का क्या तात्पर्य है, यह बहुत पहले ही स्वर्गीय डा. फतहसिंह द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है। पूर्व दिशा ज्ञान से, दक्षिण दिशा दक्षता प्राप्ति से,  पश्चिम दिशा सत्यानृत विवेक व पापों के जलाने से, उत्तर दिशा आनन्द से सम्बन्धित हैं। अन्त्येष्टि कर्म में देह के चारों ओर प्रदक्षिणा करके अग्नि का दाह कर दिया जाता है। फिर जिस दिशा की अग्नि सबसे पहले प्रज्वलित हो जाए, उसी के अनुसार भविष्यवाणी की जाती है कि प्रेत इस लोक को गया है(अन्त्येष्टि दीपिका)।

          वृथाग्नि या दावाग्नि या अरण्य की अग्नि किसे कहते हैं, इसका उत्तर लक्ष्मीनारायण संहिता १.३८०.३९ के आधार पर दिया जा सकता है। हमारे अन्दर जो भी काम, क्रोध आदि के आवेग हैं, वह वृथाग्नि हैं। इन आवेगों की अग्नि को तप द्वारा व्यवस्थित बनाना है जिससे यह अग्नि लक्ष्मीनारायण संहिता की भाषा में कृष्ण मृग बन जाए। ब्रह्माण्ड पुराण में एक कथा आती है कि मध्यपुष्कर में तपोरत परशुराम के समक्ष एक मृग-मृगी प्रकट हुए जिन्होंने कहा कि यदि परशुराम कनिष्ठ पुष्कर में जाकर अगस्त्य से कृष्णप्रेमामृत स्तोत्र की दीक्षा लेले तो उसे सफलता मिल सकती है। यह संकेत देता है कि वृथा अग्नि को व्यवस्थित बनाना और उससे भविष्य के लिए दिशानिर्देश प्राप्त करना तप का एक लक्ष्य है।

अथर्वेवेद ८.३.१९ तथा १८.४.११ में भी अग्नि द्वारा विभिन्न दिशाओं में तप द्वारा शम् करने के उल्लेख आए हैं जिनमें अधर/अधोदिशा भी है। लेकिन ऊर्ध्व-अधोदिशा में तपन का कार्य मुख्य रूप से आदित्य का कहा गया है-

स॒त्येनो॒र्ध्वस्त॑पति॒ ब्रह्म॑णा॒र्वाङ् वि प॑श्यति। प्रा॒णेन॑ ति॒र्यङ् प्राण॑ति॒ यस्मि॑न् ज्ये॒ष्ठमधि॑ श्रि॒तम्।। - अ. १०.८.१९

अथर्ववेद १३.३.१६ में भी सूर्य द्वारा ऊर्ध्व दिशा में द्युलोक को तपाने का उल्लेख है

शु॒क्रं व॑हन्ति॒ हर॑यो रघु॒ष्यदो॑ दे॒वं दि॒वि वर्च॑सा॒ भ्राज॑मानम्। यस्यो॒र्ध्वा दिवं॑ त॒न्व॑१॒स्तप॑न्त्य॒र्वाङ् सु॒वर्णैः॑ पट॒रैर्वि भा॑ति॒ तस्य॑ दे॒वस्य॑। - - -

अथर्ववेद ६.९१.२ में सूर्य द्वारा अधोदिशा में तापन का उल्लेख है-

न्य॑१॒ग् वातो॑ वाति॒ न्यक् तपति॒ सूर्यः॑। नी॒चीन॑म॒घ्न्या दु॑हे॒ न्यग् भवतु ते॒ रपः॑।।

तप अथवा तापन का कार्य केवल अग्नि और सूर्य तक सीमित नहीं है। अथर्ववेद २.१९ से लेकर २.२३ तक के सूक्त क्रमशः अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और आपः के तप से सम्बन्धित हैं

अग्ने॒ यत् ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तप॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

अग्ने॒ यत् ते॒ हर॒स्तेन॒ तं प्रति॑ हर॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

अग्ने॒ यत् ते॒ऽर्चिस्तेन॒ तं प्रत्य॑र्च॒ यो॒३॒स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

अग्ने॒ यत् ते शो॒चिस्तेन॒ तं प्रति॑ शोच॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

अग्ने॒ यत् ते॒ तेज॒स्तेन॒ तम॑ते॒जसं॑ कृणु॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।।

 

वायो॒ यत् ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति तप॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

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सूर्य॒ यत् ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तप॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

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चन्द्र॒ यत् ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तप॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

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आपो॒ यद् व॒स्तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तपत॒ यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः।

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जैमिनीय ब्राह्मण में गवामयन याग के संदर्भ में कहा गया है कि जब सूर्य का तेज इतना प्रखर हो गया कि उसको सहना कठिन हो गया तो देवों ने सूर्य के ऊपर चन्द्रमा को स्थापित किया और सूर्य के नीचे वायु प्रवाहित की। यह कथन अथर्ववेद के उपरोक्त सूक्तों को समझने में उपयोगी हो सकता है।

अग्नि व सूर्य द्वारा तापन यों तो तप में बहुत से देवों का योगदान हो सकता है, लेकिन लगता है कि मुख्य रूप से सूर्य और अग्नि के योगदान का ही वर्णन आता है। यह कहा जा सकता है कि अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि हविर्यज्ञों द्वारा अग्नि के तापन में दक्षता लाई जाती है। उसके पश्चात् हविरहित सोमयागों द्वारा सूर्य के तापन में दक्षता उत्पन्न की जाती है। एक यजु में कहा गया है भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम्। - वाजसनेयि संहिता १.१८

भृगु-अंगिरसों का तप अग्नि का तप हो सकता है- धीमी गति से प्रगति करने वाला। ब्रह्म पुराण आदि में एक कथा आती है कि अंगिरस अपना याग श्वः सुत्या द्वारा करते हैं जबकि सूर्य अद्यसुत्या द्वारा। याग के अन्त में सूर्य ने अंगिरसों को अश्व दिया लेकिन अंगिरस उस चंचल अश्व को संभाल नहीं पाए। तब उन्होंने अश्व को वापस देकर पृथिवी रूपा गौ प्राप्त की।  स्कन्द पुराण ५.३.१८१ में शिव पार्वती द्वारा तपोरत भृगु की परीक्षा लेने की कथा है। पार्वती का शिव से कहना था कि भृगु इतना कठोर तप कर रहे हैं लेकिन आप फल नहीं देते। तब शिव ने ब्रह्मा को भृगु की परीक्षा लेने के लिए कहा। ब्रह्मा वृषभ रूप धारण करके भृगु के समक्ष गए और अपने सींगों व खुरों से भृगु को ताडित किया। तब भृगु क्रोधित हो उठे। शिव का वृषभ तप का रूप है, लेकिन असली परीक्षा तो तब है जब तप क्रिया रूप में आ जाए। ब्रह्मा का वृषभ बनना क्रिया रूप की ओर संकेत करता है। चंचल अश्व को वश में करने का कार्य सूर्य के तप द्वारा किया जा सकता है।

     ऐसा प्रतीत होता है कि अग्नि के स्तर पर तप से प्रेति, आकाश की ओर अग्रसर होने की सामर्थ्य आती है, जबकि सूर्य के स्तर पर तप से इस ब्रह्माण्ड की शक्तियों को आकर्षित करने की सामर्थ्य उत्पन्न होती है(शतपथ १४.१.४.२)। कहा गया है कि यह सूर्य देवों आदि का गर्भ बन जाता है। गर्भ की यह विशेषता होती है कि वह सारे शरीर की ऊर्जा का पान करने में समर्थ होता है। अथर्ववेद ३.१०.१२ तथा ११.७.२ में भी तप के संदर्भ में गर्भ बनने के उल्लेख आते हैं।

दीक्षा व तप

दी॒क्षाऽसि॒ तप॑सो॒ योनिः॑। तपो॑ऽसि॒ ब्रह्म॑णो॒ योनिः॑। ब्रह्मा॑सि क्ष॒त्त्रस्य॒ योनिः॑। क्ष॒त्त्रम॑स्यृ॒तस्य॒ योनिः॑। ऋ॒तम॑सि॒ भूरार॑भे श्र॒द्धां मन॑सा। दी॒क्षां तप॑सा। विश्व॑स्य॒ भुव॑न॒स्याधि॑पत्नीम्। सर्वे॒ कामा॒ यज॑मानस्य सन्तु। - तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.७.७.१

पृ॒थि॒वी दी॒क्षा। तया॒ऽग्निर्दी॒क्षया॑ दीक्षि॒तः। - - - अ॒न्तरि॑क्षं दी॒क्षा। तया॑ वा॒युर्दी॒क्षया॑ दीक्षि॒तः। - - - द्यौर्दी॒क्षा। तया॑ऽऽदि॒त्यो दी॒क्षया॑ दीक्षि॒तः। - - - दिशो॑ दी॒क्षा। तया॑ च॒न्द्रमा॑ दी॒क्षया॑ दीक्षि॒तः। - - आपो॑ दी॒क्षा। तया॒ वरु॑णो॒ राजा॑ दी॒क्षया॑ दीक्षि॒तः। - - -ओष॑धयो दी॒क्षा। तया॒ सोमो॒ राजा॑ दी॒क्षया॑ दीक्षि॒तः। - - - वाग्दी॒क्षा। तया॑ प्रा॒णो दी॒क्षया॑ दीक्षि॒तः। - तै.ब्रा. ३.७.७.४

प्र॒जाप॑तिरकामयताश्वमे॒धेन॑ यजे॒येति॑। स तपोऽतप्यत। तस्य॑ तेपा॒नस्य॑। स॒प्ताऽऽत्मनो॑ दे॒वता॒ उद॑क्रामन्। सा दी॒क्षाऽभ॑वत्। स ए॒तानि॑ वैश्वदे॒वान्य॑पश्यत्। तान्य॑जुहोत्। तैर्वै स दी॒क्षामवा॑रुन्ध।- - - - स॒प्त संप॑द्यन्ते। स॒प्त वै शी॑र्ष॒ण्याः॑ प्रा॒णाः। प्रा॒णा दी॒क्षा। - तै.ब्रा. ३.८.१०.१    

तैत्तिरीय आरण्यक १०.६२.२ का कथन है कि अनशन से बडा कोई तप नहीं है। इस कथन को इस प्रकार समझने का प्रयत्न किया जा सकता है कि दीक्षा में दीक्षित आचार्य का गर्भ बन जाता है और गर्भ सारे शरीर से पोषण पाता है। उसे अशन की आवश्यकता नहीं है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.८.१०.१ का कथन है कि सात शीर्ष प्राणों का विकसित हो जाना ही दीक्षा है। वही निचले प्राणों को अन्न प्रदान करेंगे।

Vedic contexts on Tapa

प्रथम लेखन- १२-९-२०११ ई.(भाद्रपद पूर्णिमा, विक्रम संवत् २०६८)