पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Jalodbhava  to Tundikera)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Jalodbhava - Jaatipushpa (Jahnu, Jagrata / awake, Jaajali, Jaataveda / fire, Jaati / cast etc.)

Jaatukarnya - Jaala  (Jaatukarnya, Jaanaki, Jaabaali, Jaambavati, Jaambavaan etc. )  

Jaala - Jeeva  (Jaala / net, Jaalandhara, Jaahnavi, Jihvaa / tongue, Jeemuuta, Jeeva etc.)

Jeeva - Jaimini ( Jeevana / life, Jrimbha, Jaigeeshavya, Jaimini etc.) 

Joshtri - Jyeshthaa (Jnaana / knowledge, Jyaamagha, Jyeshthaa etc. )  

Jyeshthaa - Jwalanaa  ( Jyeshthaa, Jyoti / light, Jyotisha / astrology, Jyotishmaan, Jyotsnaa, Jwara / fever etc. )

Jwalanaa - Dhaundhaa (Jwaala / fire, Tittibha, Damaru, Daakini, Dimbhaka, Dhundhi etc.)

Ta - Tatpurusha ( Taksha / carpenter, Takshaka, Takshashilaa, Tattva / fact / element etc. ) 

Tatpurusha - Tapa (Tatpurusha, Tanu / body, Tantra / system, Tanmaatraa, Tapa / penance etc. )

Tapa - Tamasaa (Tapa, Tapati, Tama / dark, Tamasaa etc.)

Tamaala - Taamasi (Tarpana / oblation, Tala / level, Taatakaa, Taapasa, Taamasa etc.)

Taamisra - Taaraka (Taamisra, Taamboola / betel, Taamra / copper, Taamraparni, Taamraa, Taaraka etc.)

Taaraka - Taala (Taaraa, Taarkshya, Taala etc.)

Taala - Tithi  (Taalaketu, Taalajangha, Titikshaa, Tithi / date etc. )

Tithi - Tilottamaa  (Tila / sesame, Tilaka, Tilottamaa etc.)

Tilottamaa - Tundikera (Tishya, Teertha / holy place, Tungabhadra etc.)

 

 

 

जैगीषव्य

टिप्पणी जिगीषा जीतने की इच्छा को कहते हैं। जैगीषव्य का अर्थ होगा -- वह जो जीतने योग्य है। उसी को जीतने की इच्छा करनी चाहिए। जो जीवन का सबसे बडा लक्ष्य है मोक्ष प्राप्ति उसी को जीतने की इच्छा करनी चाहिए। दैनिक जीवन में प्रायः ऐसा घटित होता है कि मनुष्य अपना एक लक्ष्य निर्धारित करता है कि उसे इस कार्य में येन केन प्रकारेण सफलता प्राप्त करनी ही है। और जब वह सफलता मिल जाती है तो फिर जीवन में एक शून्यता का क्षण आ जाता है कि इससे आगे क्या करें। जैगीषव्य की कथा जीवन की इसी शैली का प्रतिनिधित्व करती है।  वराह पुराण 4 तथा स्कन्द पुराण 5.2.59 में जैगीषव्य द्वारा गरुड या श्येन रूप धारण करने का उल्लेख है जो विष्णु का वाहन बन जाता है। इस कथा में गरुड को जीतने की इच्छा का क्रमिक विकास कह सकते हैं। अन्तर इतना ही है कि गरुड की गति ऊर्ध्वमुखी होती है। सामान्य जीवन में जीतने की इच्छा तिर्यक दिशा में, संसार के अनुदिश होती है।  पुराणों में प्रायः राजाओं द्वारा पृथिवी को जीतने की इच्छा के भी उल्लेख आते हैं और इन्हीं उल्लेखों में यह कहा गया है कि स्वर्ग को जीतने से पहले पृथिवी को जीतना आवश्यक है(वाल्मीकि रामायण 7.59.10)।  और पृथिवी को जीतने से पहले स्वयं को जीतना आवश्यक है, स्वयं को जीतने के पश्चात् अमात्यों को जीतना है, उसके पश्चात् अमित्रों को जीतना है(महाभारत उद्योग पर्व 34.55)। मार्कण्डेय पुराण 27 व विष्णु पुराण 4.24.129 के अनुसार सबसे पहले स्वयं या आत्मा को जीतना है, उसके पश्चात् मन्त्रियों को, उसके पश्चात् भृत्यों को, उसके पश्चात् पुरवासियों को और उसके पश्चात् वैरियों को जीतना है। जो अजितात्मा इस क्रम का अनुसरण नहीं करता, वह अमात्यों को जीत लेने के पश्चात् भी शत्रुवर्ग द्वारा बंधित होता है।  स्कन्द पुराण प्रभासखण्ड 1.255.8 में उल्लेख है कि समाधि के द्वारा सनातन ब्रह्मलोक को जीतने की इच्छा की जाती है।

     भगवद्गीता 10.38 में विभूति योग के अन्तर्गत कृष्ण कहते हैं कि जिगीषुओं में वह नीति हैं। अन्यत्र (मत्स्य पुराण 148.65, 223.15) यह स्पष्ट किया गया है कि नीति के चार अंग हैं साम, दान या दाम, दंड और भेद। संसार में जो लोग निश्चय कर लेते हैं कि उन्हें किसी कार्य को सफल बनाना ही है, वे इसी नीति का अनुसरण करते हैं। लेकिन यह विचारणीय है कि जो भक्त ईश्वर आराधना में लग गया है, अपनी सफलता का लक्ष्य ऊर्ध्वमुखी बना लिया है, उसके लिए नीति किस प्रकार की होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि भागवत पुराण में जब उल्लेख आता है कि ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः।। इस प्रकार इस श्लोक में प्रेम, मैत्री, कृपा व उपेक्षा क्या साम, दान, दण्ड, भेद के तुल्य हैं या नहीं, यह विचारणीय है।

     यह उल्लेखनीय है कि जैगीषव्य के संदर्भ में पुराणों में जैगीषव्य को कपिल मुनि से शिक्षा ग्रहण करते हुए दिखाया गया है। कपिल सांख्य योग के ज्ञाता हैं और सांख्य योग वहां उपयुक्त है जहां जीवन में द्यूत विद्यमान है, घटनाओं के घटित होने में कारण कार्य का तारतम्य दिखाई नहीं पडता क्योंकि पापों का नाश नहीं हुआ है। लेकिन जैगीषव्य की विशेषता यह है कि पाप नाश न होने पर भी वह आभासी रूप में विष्णु की कल्पना करने में सफल हो जाता है। उसके लिए कपिल ही विष्णु बन जाते हैं और वह स्वयं गरुड बन जाता है।

     महाभारत शल्यपर्व 50 में वर्णन आता है कि जैगीषव्य मुनि असित देवल मुनि के आश्रम में आकर बैठ गए और तप करने लगे। असित देवल ने देखा कि जैगीषव्य की तप से प्राप्त सिद्धियों का स्तर उनकी अपनी सिद्धियों से अधिक है। अन्तिम स्तर ब्रह्म की प्राप्ति में तो केवल जैगीषव्य ही समर्थ हैं। शान्ति पर्व 229 में जैगीषव्य असित देवल को उपदेश देते हैं। यह उल्लेखनीय है कि पुराणों में जैगीषव्य द्वारा श्येन या गरुड बनकर कपिल रूपी विष्णु को अपने ऊपर धारण करने की जो कथा है, उसका मूल वैदिक साहित्य में असित देवल का आसितं साम प्रतीत होता है जिसके बारे में कहा गया है कि ऋषियों ने सोचा कि यह जो स्वर्ग रूपी उपरि श्येन है, उसकी हम जिगीषा करें। तब उन्होंने आसितं साम का दर्शन किया। इस आधार पर पुराणों में असित देवल और जैगीषव्य के कथानक की रचना की गई है। पुराणों में असित देवल को प्रत्यूष (प्रति उषा) वसु का पुत्र कहा गया है। उषा से तात्पर्य अपने पापों के उदित होने से है। यदि उनके उदय को किसी प्रकार रोक दिया जाए तो तब दैव भाग्य को वश में करने वाले देवल का जन्म होगा जहां जीवन में भाग्य प्रधान नहीं रह जाएगा, अपितु पुरुषार्थ प्रधान होगा।

     वेद की संहिताओं में जैगीषव्य का नाम किसी ऋषि के रूप में उपलब्ध नहीं हुआ है।

प्रथम लेखन 13-12-2014ई.( पौष कृष्ण सप्तमी, विक्रम संवत् 2071)

संदर्भ

*अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष आ पदे गोः ।

यदा ते मर्तो अनु भोगमानळ् आदिद्ग्रसिष्ठ ओषधीरजीगः ॥(दे. अश्वः) ऋ. १,१६३.०७

*स्तुतासो नो मरुतो मृळयन्तूत स्तुतो मघवा शम्भविष्ठः ।

ऊर्ध्वा नः सन्तु कोम्या वनान्यहानि विश्वा मरुतो जिगीषा ॥१,१७१.०३

*उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः ।

समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन् ॥१,१८६.०४

*न म इन्द्रेण सख्यं वि योषदस्मभ्यमस्य दक्षिणा दुहीत ।

उप ज्येष्ठे वरूथे गभस्तौ प्रायेप्राये जिगीवांसः स्याम ॥ ,०१८.०८

*समाववर्ति विष्ठितो जिगीषुर्विश्वेषां कामश्चरताममाभूत् ।

शश्वां अपो विकृतं हित्व्यागादनु व्रतं सवितुर्दैव्यस्य ॥ ,०३८.०६

*अषाळ्हो अग्ने वृषभो दिदीहि पुरो विश्वाः सौभगा संजिगीवान् ।

यज्ञस्य नेता प्रथमस्य पायोर्जातवेदो बृहतः सुप्रणीते ॥ ,०१५.०४

*द्बंहिष्ठं नातिविधे सुदानू अच्छिद्रं शर्म भुवनस्य गोपा ।

तेन नो मित्रावरुणावविष्टं सिषासन्तो जिगीवांसः स्याम ॥ ,०६२.०९

*यस्ते मदः पृतनाषाळ् अमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवांसम् ।

येन तोकस्य तनयस्य सातौ मंसीमहि जिगीवांसस्त्वोताः ॥६,०१९.०७

*रथानां न येऽराः सनाभयो जिगीवांसो न शूरा अभिद्यवः ।

वरेयवो न मर्या घृतप्रुषोऽभिस्वर्तारो अर्कं न सुष्टुभः ॥१०,०७८.०४

*ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ।

अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीषति ॥१८॥ -  शौ.अ. 11.5.18 11.7.18

*अग्नये वाजसृते पुरोडाशम् अष्टाकपालं निर् वपेत् संग्रामे संयत्ते वाजं वा एष सिसीर्षति यः संग्रामं जिगीषति । - तै.सं. 2.2.4.6

*पतयन्तम् पतंगम् । शिरो अपश्यम् पथिभिः सुगेभिर् अरेणुभिर् जेहमानम् पतत्रि ॥ अत्रा ते रूपम् उत्तमम् अपश्यं जिगीषमाणम् इष आ पदे गोः । यदा ते मर्तो अनु भोगम् आनड् आद् इद् ग्रसिष्ठ ओषधीर् अजीगः ॥ - तै.सं. 4.6.7.3

*उपसद्धोमाभिधानम् -     तेषाम् असुराणां तिस्रः पुर आसन्न् अयस्मय्य् अवमाथ रजताथ हरिणी     ता देवा जेतुं नाशक्नुवन् ता उपसदैवाजिगीषन् तै.सं. 6.2.3.1

*ते हाविजयमाना ऊचुर्हन्त वाच्येव ब्रह्मन्विजिगीषामहै स यो नो वाचं  व्याहृतां मिथुनेन नानुनिक्रामात्स सर्वं पराजयाता अथ सर्वमितरे जयानिति तथेति देवा अब्रुवंस्ते देवा इन्द्रमब्रुवन्व्याहरेति मा.श. 1.5.4.5

*चित्रं ह भवति हन्ति सपत्नान्हन्ति द्विषन्तं भ्रातृव्यं य एवं विद्वांश्चित्रायामाधत्ते तस्मादेतत्क्षत्रिय एव नक्षत्रमुपेर्त्सेज्जिघांसतीव ह्येष सपत्नान्वीव जिगीषते मा.श. 2.1.2.17

*एतद्वा इन्द्रस्य निष्केवल्यं सवनं यन्माध्यन्दिनं सवनं तेन वृत्रमजिघांसत्तेन व्यजिगीषत मरुतो वा इत्यश्वत्थेऽपक्रम्य तस्थुः क्षत्रं वा इन्द्रो विशो मरुतो विशा वै क्षत्रियो बलवान्भवति तस्मादाश्वत्थे ऋतुपात्रे स्यातां कार्ष्मर्यमये त्वेव भवतः  - मा.श. 4.3.3.6

*अथ य इच्छेत्  पुत्रो मे पण्डितो विजिगीथः समितिंगमः शूश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान्वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवा औक्ष्णेन वार्षभेण वा मा.श. 14.9.4.17

*देवा वै मृत्युना समयतन्त। स यो ह स मृत्युर् अग्निर् एव सः। ते ऽब्रुवन्न् एते ऽमुं जिगीषामेति। ते ऽब्रुवन्न् आज्याहुतिं जुहुवाम तयैनं जिगीषामेति। तथेति। त आज्याहुतिम् अजुहवुः। ताम् अन्नम् अकुरुत तां प्रत्युददीप्यत। तस्माद् यत्राज्याहुतिं जुह्वति प्रत्युद्दीप्यत एव॥ ते ऽब्रुवन् पश्वाहुतिं जुहवाम तयैनं जिगीषामेति। तथेति। ते पशुम् आलभ्य मेदस् समवदाय पश्वाहुतिम् अजुहवुः। ताम् अन्नम् अकुरुत तां प्रत्युददीप्यत। तस्माद् यत्र पश्वाहुतिं जुह्वति प्रत्युद्दीप्यत एव॥ ते ऽब्रुवन् क्षीराहुतिं जुहवाम तयैनं जिगीषामेति। तथेति ते क्षीराहुतिम् अजुहवुः। तयैनम् अजयन्। तस्माद् यत्र क्षीराहुतिं जुह्वत्य् अङ्गारा एव भवन्ति। ते ऽब्रुवन्न् अजेषु वा एनम् अन्नेन हन्तानपजय्यं जिगीषामेति॥12॥ ते ऽब्रुवन् सोमाहुतिं जुहवाम तयैनं जिगीषामेति। तथेति। ते सोमेनायजन्त। ते सोमाहुतिम् अजुहवुः। तयैनं प्राजयन्। तस्माद् यत्र सोमाहुतिं जुह्वत्य अङ्गारा एव भवन्ति॥ स य एवं विद्वान् आज्याहुतिं च पश्वाहुतिं जुहोति प्रियम् एवास्य तेन धामोपगच्छति। अथ यत् क्षीराहुतिं जुहोति जयत्य् एवैनं तेन। अथ यत् सोमाहुतिं जुहोति यथा जित्वा प्रजयेत् तादृक् तत्। स एतौ पुनर्मृत्यू अतिमुच्यते यद् अहोरात्रे॥- जै.ब्रा. 1.13॥

*कृतेन तज् जयति यज् जिगीषति। कृतेनोद्भिनत्ति। अथो पक्षाव् एतौ यत् पवमानौ। ताव् एव तत् समौ करोति। - जै.ब्रा. 1.235

*तम् एतम् अन्नं जिगीवांसं सर्वे देवा अभिसमगच्छन्त। ते वै तन् नाविन्दन्त।। 238 ।। तम् अब्रुवन् - स वै नो यस् ते ऽयं निष्केवल्यो यज्ञस्, तं प्रयच्छेति। तस्माद् राजनि विजिगीषमाणे विशः प्रदानम् इच्छन्ते। तस्माद् उ राजा विजिगीषमाणो विश एव प्रदानं प्रयच्छति। - जै.ब्रा. 2.139

*अथासितम्। ऋषयो वा अब्रुवन्न् - एतेमम् उपरिश्येनं स्वर्गं लोकं जिगीषाम, यद् अस्मिन्न् एते ऽथर्वाण इति। - जै.ब्रा. 3.270

*अथ हासितो दैवल उवाचैतम् एवाहं चमसम् अवेक्षा इति। स होवाचैष एवैषाम् एको व्रतयति। तं हैवावेक्ष्यैतत् साम ददर्श। तेनास्तुत।

राये अग्ने महे त्वा दानाय सम् इधीमहि।

ईळिष्वा हि महे वृषं द्यावा होत्राय पृथिवी॥

इति। द्यावापृथिवी सर्व इमे लोकाः। ततो वै स सर्वान् इमान् लोकान् अनुसमचरत्। स ह पूर्वाह्ण एव देवानां समित्याम् आस, मध्यन्दिने मनुष्याणां द्रुपदस्य वार्द्ध्रविष्णस्य, अपराह्णे पितृणाम्। तद् एतत् स्वर्ग्यं साम। सर्वान् इमान् लोकान् अनुसंचरत्य्, अश्नुते स्वर्गं लोकं य एवं वेद। यद् व् असितो दैवलो ऽपश्यत्, तस्माद् आसितम् इत्य् आख्यायते॥ जै.ब्रा. 3.271॥

*अभिजिदभिजिगीषतः  ।१५। विश्वजिद्विश्वं जिगीषतः   शां.श्रौ.सू. 14.42.16

*इन्द्रो वै नॄञ्जिगीषंस्तपस्तप्त्वैतं यज्ञक्रतुमपश्यन्नृजितम्  ।  तेनेष्ट्वा नॄनजयत्  ।  तेन नॄञ्जिगीषन्यजेत  शां.श्रौ.सू. 14.43.१

*इन्द्रो वै पृतनाजं जिगीषंस्तपस्तप्त्वैतं यज्ञक्रतुमपश्यत्पृतनाजितम्  ।  तेनेष्ट्वा

पृतनाजमजयत्  ।  तेन पृतनाजं जिगीषन्यजेत  शां.श्रौ.सू. 14.44.१

*इन्द्रो वै सत्राजं जिगीषंस्तपस्तप्त्वैतं यज्ञक्रतुमपश्यत्सत्राजितम्  ।  तेनेष्ट्वा सत्राजमजयत्  ।  तेन सत्राजं जिगीषन्यजेत ।१। प्रथमात्त्र्यहान्मध्यन्दिनेषु

निविद्धानानि - शां.श्रौ.सू. 14.45.२

*इन्द्रो वै धनं जिगीषंस्तपस्तप्त्वैतं यज्ञक्रतुमपश्यद्धनजितम्  ।  तेनेष्ट्वा धनम-

जयत्  ।  तेन धनं जिगीषन्यजेत  ।१। चतुर्विंशमहः  शां.श्रौ.सू. 14.46.२

*इन्द्रो वै स्वर्जिगीषंस्तपस्तप्त्वैतं यज्ञक्रतुमपश्यत्स्वर्जितम्  ।  तेनेष्ट्वा स्वरजयत्  तेन स्वर्जिगीषन्यजेत  ।१। उत्सन्नयज्ञ इव वा एष यत्स्वर्जित्  ।- शां.श्रौ.सू. ।14.47.२।

*इन्द्रो वै सर्वं जिगीषंस्तपस्तप्त्वैतं यज्ञक्रतुमपश्यत्सर्वजितम्  ।  तेनेष्ट्वा सर्वम-

जयत्  ।  तेन सर्वं जिगीषन्यजेत  ।१। महाव्रतीयमहः - शां.श्रौ.सू. 14.48.२

*इन्द्रो वै सर्वमुज्जिगीषंस्तपस्तप्त्वैतं यज्ञक्रतुमपश्यदुज्जितम्  ।  तेनेष्ट्वा सर्वमुद-

जयत्  ।  तेन सर्वमुज्जिगीषन्यजेत  । - शां.श्रौ.सू. 14.49.१।

*उप तं यज्ञक्रतुं जानीम येनैनमुपाह्वयेमहीति  ।  त एतमुपहव्यं यज्ञक्रतुमपश्यन्  ।  तेनैनमुपाह्वयन्त  ।  तेनावरुद्धो राजा यजेत राष्ट्रमवजिगीषन्  ।  - शां.श्रौ.सू.14.50.

संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम्।। - विभूतिपाद 18

व्यासभाष्य - द्वये खल्वमी संस्काराः स्मृतिक्लेशहेतवो वासनारूपाः, विपाकहेतवो धर्माधर्मरूपाः। ते पूर्वभवाभिसंस्कृताः परिणाम चेष्टा निरोध शक्ति जीवन धर्मवदपरिदृष्टाश्वित्तधर्माः। तेषु संयमः संस्कारसाक्षात्क्रियायै समर्थः, न च देशकालनिमित्तानुभवै विना तेषामस्ति साक्षात्करणम्। तदित्थं संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानमुत्पद्यते योगिनः। परत्राप्येवमेव संस्कारसाक्षात्करणात्परजातिसंवेदनम्।

अत्रेदमाख्यानं श्रूयते भगवतो जैगीषव्यस्य संस्कारसाक्षात्करणाद् दशसु महासर्गेषु जन्मपरिणामक्रममनुपश्यतो विवेकजं ज्ञानं प्रादुरभवत्। अथ भगवानावट्यस्तनुधरस्तमुवाच दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन त्वया नरकतिर्यग्गर्भसंभवं दुःखं संपश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन सुखदुःखयोः किमधिकमुपलब्धमिति। भगवन्तमावट्यं जैगीषव्य उवाच दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन मया नरकतिर्यग्भवं दुःखं संपश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन यत् किञ्चिदनुभूतं तत्सर्वं दुःखमेव प्रत्यवैमि।

भगवानावट्य उवाच यदिदमायुष्मतः प्रधानवशित्वमनुत्तमं च संतोषसुखं किमिदमपि दुःखपक्षे निक्षिप्तमिति। भगवान् जैगीषव्य उवाच विषयसुखापेक्षयैवेदमनुत्तमं संतोषसुखमुक्तम्, कैवल्यापेक्षया दुःखमेव। बुद्धिसत्त्वस्यायं धर्मस्त्रिगुणः, त्रिगुणश्च प्रत्ययो हेयपक्षे न्यस्त इति। दुःखस्वरूपस्तृष्णातन्तुः, तृष्णादुःखसन्तापापगमात्तु प्रसन्नमबाधं सर्वानुकूलं सुखमिदमुक्तमिति।।18।।

*दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।। - भगवद्गीता 10.38

*अविजित्य य आत्मानममात्यान्विजिगीषते |

अमित्रान्वाजितामात्यः सोऽवशः परिहीयते ॥५४॥

आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जयेत् |

ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ॥५५॥ - महा. उद्योगपर्व 34.55, 129.27

*बाह्यश्चेद्विजिगीषुः स्याद्धर्मार्थकुशलः शुचिः |
जवेन सन्धिं कुर्वीत पूर्वान्पूर्वान्विमोक्षयन् ॥४॥
अधर्मविजिगीषुश्चेद्बलवान्पापनिश्चयः |
आत्मनः संनिरोधेन सन्धिं तेनाभियोजयेत् ॥५॥ महा. शान्ति 131.5
*वेदश्रुतिभिराख्यानैरर्थानभिजिगीषते |
तितिक्षुरनवज्ञश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥महा. शान्ति 230.११॥

*एवं ते नियतात्मानो दमयुक्तास्तपस्विनः ।। समाधिना जिगीषन्ते

ब्रह्मलोकं सनातनम्।। स्कन्द प्रभास 1.255.८ ।।

*सामपूर्वा स्मृता नीतिश्चतुरङ्गा पताकिनी

जिगीषतां सुरश्रेष्ठ स्थितिरेषा सनातनी  65

साम भेदस्तथा दानं दण्डश्चाङ्गचतुष्टयम्

नीतौ क्रमाद्देशकालरिपुयोग्यक्रमादिदम् - मत्स्य 148.66

*परतः कोपमुत्पाद्य भेदेन विजिगीषुणा

ज्ञातीनां भेदनं कार्यं परेषां विजिगीषुणा  12

रक्ष्यश्चैव प्रयत्नेन ज्ञातिभेदस्तथाऽऽत्मनः

ज्ञातयः परितप्यन्ते सततं परितापिताः  13

तथाऽपि तेषां कर्तव्यं सुगम्भीरेण चेतसा

ग्रहणं दानमानाभ्यां भेदस्तेभ्यो मयंकरः  14

ज्ञातिमनुगृह्णन्ति ज्ञातिं विश्वसन्ति

ज्ञातिभिर्भेदनीयास्तु रिपवस्तेन पार्थिवैः  मत्स्य 223.15

*एवं दशविधा भक्तिः संसारच्छेदकारिणी

तत्रापि सात्विकी भक्तिः सर्वकामफलप्रदा १५१

तस्माच्छृणुष्व भूपाल संसारविजिगीषुणा

स्वकर्मणोऽविरोधेन भक्तिः कार्या जनार्दने १५२

यः स्वधर्मं परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति

न तस्य तुष्यते विष्णुराचारेणैव तुष्यते - नारद पु. 1.15.१५३

*रामः परशुरामश्च नृसिंहो विष्णुरेव च  ॥२८३.००७

त्रिविक्रमश्च नामानि जप्तव्यानि जिगीषुभिः  । अग्नि पु. २८३.००८

*योगाभ्यासे सदा युक्तः संसारविजिगीषया।

एवंवृत्तः सदाचारो मोक्षकाङ्क्षी जितेन्द्रियः॥गरुड पु. २,२२.२६॥

*योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम्  ।

आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम्  ॥ भागवत पु. 11.16.024

*प्रागात्मा मन्त्रिणश्चैव ततो भृत्या महीभृता  ।

जेयाश्चानन्तरं पौरा विरुध्येत ततोऽरिभिः  ॥ २७.१० ॥

यस्त्वेतानविजित्यैव वैरिणो विजिगीषते  ।

सोऽजितात्मा जितामात्यः शत्रुवर्गेण बाध्यते  ॥ २७.११ ॥

तस्मात्कामादयः पूर्वं जेयाः पुत्र ! महीभुजा  ।

तज्जये हि जयोऽवश्यं राजा नश्यति तैर्जितः  ॥-मार्कण्डेय पु. २७.१२ ॥

*सामपूर्वाश्रुतानीतिश्चतुरंगापताकिनी ८५

जिगीषतांसुरश्रेष्ठस्थितिरेषासनातनी

सामभेदस्तथादानंदंडश्चांगचतुष्टयम् पद्म पु. 1.42.८६

७.०५९.००५ *मान्धता इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान्

७.०५९.००६  स कृत्वा पृथिवीं कृत्स्नां शासने पृथिवीपतिः

७.०५९.००६ सुरलोकमथो जेतुमुद्योगमकरोन्नृपः

७.०५९.००७  इन्द्रस्य तु भयं तीव्रं सुराणां च महात्मनाम्

७.०५९.००७ मान्धातरि कृतोद्योगे देवलोकजिगीषया

७.०५९.००८  अर्धासनेन शक्रस्य राज्यार्धेन च पार्थिवः

७.०५९.००८ वन्द्यमानः सुरगणैः प्रतिज्ञामध्यरोहत

७.०५९.००९  तस्य पापमभिप्रायं विदित्वा पाकशासनः

७.०५९.००९ सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच युवनाश्वजम्

७.०५९.०१०  राजा त्वं मानुषं लोके न तावत्पुरुषर्षभ

७.०५९.०१० अकृत्वा पृथिवीं वश्यां देवराज्यमिहेच्छसि

७.०५९.०११  यदि वीर समग्रा ते मेदिनी निखिला वशे

७.०५९.०११ देवराज्यं कुरुष्वेह सभृत्यबलवाहनः

७.०५९.०१२  इन्द्रमेवं ब्रुवाणं तु मान्धाता वाक्यमब्रवीत्

७.०५९.०१२ क्व मे शक्रप्रतिहतं शासनं पृथिवीतले

७.०५९.०१३  तमुवाच सहस्राक्षो लवणो नाम राक्षसः

७.०५९.०१३ मधुपुत्रो मधुवने नाज्ञां ते कुरुतेऽनघ वा.रा. 7.59.13

*पूर्वमात्मजयं कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मन्त्रिणः  ।

ततो भृत्यांश्च पौरांश्च जिगीषन्ते तथा रिपून्  ॥ ४,२४.१२९ ॥

क्रमेणानेन जेष्यामो वयं पृथ्वीं ससागराम्  ।

इत्यासक्तधियो मृत्युं न पश्यन्त्यविद्वरगम्  ॥- विष्णु पु.  ४,२४.१३० ॥

*कर्ममार्गेण खाण्डिक्यः पृतिव्यामभवत्पतिः  ।

केशिध्वजोऽप्यतीवासीदात्मविद्याविशारदः  ॥ ६,६.९ ॥

तावुभावपि चैवास्तां विजिगीषू परस्परम्  ।

केशिध्यजेन खाण्डिक्यःस्वराज्यादवरोपितः  ॥ विष्णु पु. ६,६.१० ॥

जैगीषव्य उवाच॥

ममाष्टगुणमैश्वर्यं दत्तं भगवता पुरा |

यत्नेनाल्पेन बलिना वाराणस्यां युधिष्ठिर ॥महा. अनुशासन 18. २४॥